गरिमापूर्ण संसदीय परम्परा के नायक थे जनेश्वर मिश्र

August 5, 2015 6:51 pm0 commentsViews: 278

 

 

मणेन्द्र मिश्रा ‘मशाल’

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संसद में जारी गतिरोध से संसदीय बहस और विमर्श की चली आ रही परम्परा लगातार बाधित हो रही है.ऐसा नही है कि सदन में हो हल्ला और शोर-शराबे की यह प्रवृत्ति हाल ही में शुरू हुयी है.बल्कि पिछले कुछ सालों में इस कार्यसंस्कृति में लगातार बढ़ोत्तरी हुयी है.ऐसे में संसदीय इतिहास के उन महान व्यक्तियों के संस्मरण की आवश्यकता बढ़ जाती है.जिन्होंने संसदीय मूल्य और प्रतिरोध की उच्चतम सीमा का बेहतर समन्वय करते हुए संसद में जनता की आवाज़ बन कर उभरे.चूँकि आज समाजवादी धारा के दूसरी पीढ़ी के नायक जनेश्वर की जयंती है.

इसलिए उनके संसदीय व्याख्यान पर बात करना बेहद समीचीन होगा.छोटे लोहिया के नाम से मशहूर जनेश्वर ने अपने लम्बे संसदीय जीवन के इतिहास में हमेशा लोकतंत्र की मजबूती हेतु बुनियादी खामियों को दूर करने के लिए संसद में अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे.निचले सदन से उच्च सदन तक उनकी मौजूदगी भारत में हासिये के लोगो के भरोसे और उन्हें बेहतर जीवन का वायदा करने वाले प्रतिबद्ध नेता के तौर पर जानी गयी.संसद के मौजूदा सत्र के आलोक में जनेश्वर के संसदीय जीवन की गहन पड़ताल करने से हमें उनके दूरदर्शी नजरिये का सहज आभास हो जाता है.

अपने मृत्यु के दो वर्ष पूर्व मार्च 2008 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए छोटे लोहिया ने जिस समग्रता से अपनी बात को रखा था,वह पिछले कुछ दशकों से संसदीय इतिहास के दुर्लभ दस्तावेज़ के रूप में महत्वपूर्ण बना हुआ है.जिसमें उन्होंने मनरेगा के बहाने शहरों,कस्बों,गाँवों में हज़ारों की तादात में कूड़ा बीनने वाले बच्चों के स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार के लिए किसी भी नीति के अभाव को सरकार की बड़ी नाकामी के रूप में प्रस्तुत किया था.साथ ही इस बात को स्पष्ट किया कि देश में लगभग पचास आख की आबादी कूड़ा बीनने को अभिशप्त है.इतना ही नही साम्प्रदायिकता के बढ़ते खतरे को लेकर चिंतित भाव से उन्होंने इतिहास में हिन्दू जनमानस के मर्यादा पुरषोत्तम राम के जीवन की घटना का उल्लेख करते हुए एक बड़े विमर्श को उभारने का काम किया.

संसद के बजट सत्र में बहस करते हुए छोटे लोहिया बजट की दिशा किसानों की ओर करने की माँग पर जोर दिया करते थे.जिसके तहत उन्होंने कहा था,हर आदमी मुनाफा कमाना चाहता है.केवल किसान को आपने बाँध दिया है.वह मुनाफा नही कमा सकता है.याद रखियेगा हम लोग श्रमिक नही हैं.ये लोग भी श्रमिक नही है.हम लोग केवल पैदावार का इंतजाम देखते हैं.श्रमिक वह कहलाता है.जहाँ पसीना बहाए तो कुछ पैदा हो जाता है.

जातिगत जनगणना,प्रोन्नति में आरक्षण जैसे मसलों पर विमर्श करते हुए छोटे लोहिया के आरक्षण वाली दृष्टि को जानना और समझना बेहद सामयिक होगा.जिस पर उन्होंने जातिगत संघर्ष की घटना के समूचे देश में होने की बात कही थी.इस क्रम में उनका मानना था कि जातियां पूरे देश में हैं.जाति प्रथा का जबतक उन्मूलन नही होगा,जातियाँ बनी रहेंगी.लोहिया द्वारा दिए गए जाति तोड़ो नारे के प्रबल समर्थक जनेश्वर ने आजीवन जनेऊ का परित्याग किया साथ ही अपने जातीय पहचान वाले उपनाम को भी हटा दिया.

छोटे लोहिया ने जातियों की तुलना हसिये के दांत से किया छोटे लोहिया ने हमेशा संसद में जनप्रतिनिधि होने की जिम्मेदारी का बखूबी पालन किया.साथ ही सरकारों के सही नीतियों को प्रोत्साहन व गलत नीति का पुरजोर विरोध उनके व्यक्तित्व का मौलिक गुण था.जनता के प्रति इसी समर्पण की वजह से उनके जीवन काल में हर साल पाँच अगस्त के दिन समूचा इलाहाबाद,यूपी,बिहार सहित समाजवादी परम्परा में विश्वास रखने वाले गरीब से गरीब एवं अमीर से अमीर व्यक्ति संसद के निकट राजेन्द्र प्रसाद मार्ग पर उनके आवास लोहिया के लोग में जुटते थे.जहाँ सच्चे अर्थो में समाजवादी सिद्धांत का पालन होता था.जिसकी झलक फुटपाथ के गरीब व्यक्ति और केन्द्रीय मंत्री के एक साथ एक ही सोफे पर बैठकर भोजन करने से पता चलता था.जनेश्वर जी अब हमारे बीच नही हैं.उनको गए पाँच साल का अंतराल हो गया.

फिर भी उनके संसदीय इतिहास और जीवन चरित्र पर किसी सामग्री का न आना दुखद है.अभी एक दिन पूर्व लखनऊ में समाजवादी पार्टी की तरफ से सोशलिस्ट परम्परा के लोगों का सम्मान हुआ.लेकिन इस आयोजन में छोटे लोहिया और समाजवादी परम्परा के अनगिनत ऐसे लोग छूट गये जिन्होंने समाजवादी पार्टी की मजबूती में बड़ा काम कियाA

(लेखक समाजवादी विचारधारा के युवा चिंतक है)

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