बेचारी सालियाः अंत्योदय के अन्न से पेट तो भर रहा, लेकिन पटटे पर कब्जा नहीं दिला पा रहा बे जमीर प्रशासन

February 7, 2019 3:10 pm0 commentsViews: 202

—-  सालिया के पास पैसा नहीं होने के कारण उसके काम को नजर अंदाज कर रहे अधिकारी

—- 2016 में मिले आवासीय पट्टे की भूमि पर कब्ज़ा दिलाने में नाकाम रहा तहसील प्रशासन

निज़ाम अंसारी

शोहरतगढ़, सिद्धार्थनगर। स्थानीय  कस्बे से सटे उपनगर नीबी दोहनी निवासिनी सालिया के चार छोटे छोटे बच्चे हैं, जिनकी परवरिश वह बहुत मुश्किल से कर पाती है।  उसका पति मुनीर पेशे से सिलाई कारीगर है, जो बहुत ही कठिनाई से 100 से 150 रुपये का काम कर पाता है। किसी तरह से खाने भर का इंतेजाम हो पाता है। उसके परिवार को भोजन जुटाने में अंत्योदय योजना का बहुत बड़ी भूमिका है । बच्चों की शिक्षा दीक्षा प्राथमिक विद्द्यालय से पूरा हो पाता है। इसके द्वारा उसके बच्चों को एक टाइम का भोजन और कपडे सालिया की लाज बचाते हैं। मंहगाई के इस दौर में उसके पास अपना छत नहीं, किराये के मकान पर आधी जिंदगी गुजार चुके हैं।

किसी जनप्रतिनिधि के दौड़ धुप कर पैरवी करने से उस समय के अच्छे अधिकारियों ने पीड़ित की जांच पड़ताल कर उसे 2016 में आवासीय पट्टा  दे दिया गया । परंतु आज तक किसी भी अधिकारी ने सालिया को उसकी जमीन नापकर बताने की जरूरत नहीं समझी । 2016 से 2019 तक सालिया के पति दिन रात अधिकारियों के कार्यालयों की ख़ाक छान डाली। कई कई बार प्रार्थना पत्र दिया गया लेकिन वही भारतीय सभ्यता का सड़ा हुआ सिस्टम और बेअंदाज और मरे हुए जमीर वालों ने आदेश पर अमल नहीं करवा पाये।

बेचारी सालिया अपनी गरीबी की सजा काट रही है कई बार नाप का आदेश जारी हो चूका है। अब उसे इन  भरष्ट अधिकारियों से नफरत हो चुकी है।अब उसने ठान लिया है कि वह अपने परिवार को इस निरंकुश , निष्ठुर और कठोर दिल वालों को अपनी आखरी लड़ाई से सबक सिखाना चाहती है। गरीबी ने उसे इतना लाचार कर दिया है कि अब वह और उसका परिवार अनिश्चित कालीन आमरण अनशन पर बैठने को मजबूर हो गया है।

बताते चलें कि शोहरतगढ़ कसबे में भी लगभग दो दर्जन परिवारों के पास उनकी खुद की छत नहीं है वह बीस से लेकर पचासों सालों से किराये पर रहने को मजबूर हैं कितनों ने तहसील दिवस में अपनी अर्जियां दी हुई है जिन पर अब तक तहसील प्रशासन ने तवज्जो न देकर उनके आवेदन पत्रों को कूड़े दान में दाल दिया। तहसील क्षेत्र के तमाम ऐसे गरीब भरे पड़े हैं जिनको पट्टा आवंटन होने के बाद भी अभी तक जमीन की पैमाइश नहीं की गयी है और न ही उन्हें कब्ज़ा  ही दिलाया गया है।

 

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