यादें– १९८० के चुनाव में आंसुओं के समंदर में डूबा हुआ था डुमरियागंज का विजयी और पराजित खेमा

January 22, 2017 5:06 pm0 commentsViews: 2010
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नजीर मलिक

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सिद्धार्थनगर। जिले के चुनावी इतिहास में कुछ लमहे ऐसे हैं, जो कभी न भूलने लायक हैं। उसी में एक डुमरियागंज का वर्ष ८० का चुनाव भी है। वह एक ऐसा चुनाव रहा, जिसमें डुमरियागंज का अधिकांश लोग, चाहे वो विजेता खेमें हो या पराजित खेमे के, सभी आंसुओं के समंदर में डूबे हुये थे।

सन ८० में समाजवादी खेमे से विधायक कमाल युसुफ उम्मीदवार बनाये गये थे। उस वक्त कांग्रेस के डुमरियागंज के विधायक रहे पूर्वमंत्री काजी जलील अब्बासी को लोकसभा सदस्य निर्वाचित हो गये थे, उन्हीं की सहमति से कांग्रेस ने   युवा नेता मलिक तैफीक अहमद को उम्मीदवार बनाया था। काजी जलील अब्बासी साहब  इस चुनाव में मलिक तौफीक की पूरी तरह से मदद की थी। तौफीक साहब उस समय उभरते नेताओं में शुमार थे। कांग्रेस का जमाना था। यूपी की सत्ता भी कांग्रेस के पास थी।

जंग काफी तीखी थी

चुनाव प्रचार तीखा हुआ तो कमाल और तौफीक के खेमे में तल्खी बढ़ गई। कार्यकर्ता जगह जगह भिडने लगे। कांग्रेस का खेमा आक्रमक था। अचानक एक दिन शुक्रवार को लगने वाली परसपुर बाजार में दोनों पक्ष भिड़ गये। फिर तो मलिक कमाल यूसुफ के हर प्रचार वाहन पर असलहे लहराने लगे। तनाव चरम पर था। भानु प्रताप सिंह जैसी क्षेत्र की बडी हस्ती भी तौफीक साहब के साथ थी।

कांग्रेसी खेमे का मनोबल बढ़ा हुआ था। जिस कमाल यूयुफ ने काजी जलील जैसे नेता को करारी शिकस्त दी थी, उसे मलिक तौफीक बराबर की टक्करदे रहे थे। कमाल यूयुफ केखेमे में बेचैनी साफ झलक रही थी। उनके लड़ाके इस चुनाव को जीवन मरन का प्रश्न बना कर लड़ रहे थे।

जब इंदिरा गांधी पहुंची डुमरियागंज

अचानक डुमरियागंज में इंदिरा जी का कार्यक्रम लग गया। नार्मल मैदान में जब वह पहुंची तो वहां जन सैलाब उमड़ा हुआ था। इस ऐतिहासिक भीड़ को देख कर कमाल यूसुफ खेमा काफी हताश था। केवल दो लोग ऐसे थे, जिन्हें कमाल की जीत का यकीन था, एक विधायक कमाल यूसुफ के पिता हाजी मो यूसुफ और दूसरे कमाल के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक मलिक मुस्तकीम भाई। बहरहाल इंदिराजी के भाषण के बाद कांग्रेस की हवा और बन गई।

कमाल खेमे की रणनीति

इस दौरान कमाल खेमे को लगा की डुमरियागंज का मलिक दोनों खेमों में तकरीबन बराबर बंटा हुआ हैं। लिहाजा उसने रणनीति बदली और तोफीक साहब के कई प्रचारकों के आपराधिक चेहरों को जबरदस्त चुनावी मुददा बना दिया। राजनीति के अपराधीकरण का यह मुद्दा कारगर साबित होने लगा। पेड़ कटान जारी है, मामा की बलिहारी है, जैसे नारों के साथ मलिक तौफीक के परिजनों को भी जद में ले लिया गया।

जीत का वह दिन और आंसुओं का समंदर

बहरहाल मतगणना शुरू हुई। सबके दिल धड़क रहे थे। लोगों बसों में भर भर कर बस्ती पहुंचे थे। चुनाव परिणाम आया तो कमाल यूसुफ को ४६ हजार और तौफीक साहब को ३२ हजार वोट मिले। कमाल यूसुफ १४ हजार वोटों से चुनाव जीत गये थे।

चुनाव रिजल्ट के बाद बस्ती के कचहरी के मैदान में अजीब मंजर था। मलिक तौफीक के समर्थक दहाड़ें मार कर रोते हुए बस में बैठ रहे थे, तो विजेता कमाल यूसफ के लोग जीत की खुशी में रोते हुए अपने वाहनों पर सवार हो रहे थे। हर तरफ आंसुओं का समंदर था। इस जीत के बाद दूसरे दिन कमाल खेमा बहुत उदास था। कमाल ने जीत तो पा ली थी, मगर मन में बैठे मलिकवंशी अपनत्व के कारण वह खुल कर खुश भी नहीं हो पा रहे थे। अंत में उन्होंने जुलूस निकालने के के लिए आई भीड़ को वापस लौटा दिया। जबकि इससे पूर्व के चुनाव में उन्होंने तीन किमी लम्बा जुलूस निकाल कर अपनी खुशी का इजहार किया था।

 

 

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