12 सौ किमी साइकिल चलाने की थकान के बावजूद उनकी आंखों में थी अपनों के बीच पहुंच जाने की रुपहली उम्मीद

May 1, 2020 1:59 pm0 commentsViews: 465
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निज़ाम अंसारी

शोहरतगढ़, सिद्धार्थनगर। लुधियाना से 12 सौ किमी साइकिल का सफर आसान नही होता। वह भी ऐसी हालत में जब कि वह रास्ते में भोजन पानी की भी किल्लत हो। गत दिवस लाकउाउन के सताए  लगभग तीन दर्जन लोगों के लुधियाना से जनपद महाराजगंज जाते समय अपने आखिरी पडाव शोहरतगढ़ रुके तो उनकी भूख प्यास गायब थी और आंखों में चमक रही थी अपनों से मिलने की उम्मीद। उनकी थकान की जगह एक उत्साह ने ले लिया था।

वे 30 से अधिक लोग थे, जो लुधियाना में पेशे से मजदूर थे। इन लोगों से दोपहर में नगर स्थित डॉ अंसारी हॉस्पिटल के पास मुलाकात हुई। उन्हें रोक कर उनका हाल चाल जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि बीते 22 अप्रैल को एक दर्जन लोगों द्वारा साइकिल चलाकर आज वृहस्पतिवार को 1100 किलो मीटर की दूरी तय कर लुधियाना से चलकर शोहरतगढ़ पहुँचे थे। यहां संवाददाता से उन्होंने अपनी अपनी दर्द भरी दास्तान सुनाई। डॉ अंसारी हॉस्पिटल की तरफ से उनको खाने पीने और आराम करने के लिए कहा गया लेकिन घर पहुंचने की जल्दी में उन्होंने कुछ भी खाने पीने सेइनकार कर दिया।

ग्रुप के लोगों ने बताया कि पड़ोस के महराजगंज जिले के लक्ष्मीर नगर, पोखरभिंडा, श्रीरामपुर, बहादुरी के लगभग 30 से अधिक लोग पंजाब प्रान्त के लुधियाना में परिवार के भरण-पोषण के लिए रहकर मजदूरी कर रहे थे। कोरोना वायरस के बचाव के लिए केन्द्र सरकार व पंजाब सरकार के द्वारा जारी लाकडाउन के कारण उनके आमदनी के स्रोत बंद हो चुके थे। लिहाजा परिवार के भरण-पोषण को कौन कहे, अपने पेट को भरने की चिंता इन मजदूरों को सताने लगी थी।

मजदूरों के अनुसार धीरे-धीरे पास में रखे पैसे भी खत्म होने लगे।अब इन मजदूरों का लुधियाना में रहना संभव नहीं था और घर जाने का कोई रास्ता इनको दिखाई भी नहीं दे रहा था।  तब मजदूरों ने अपने कमरे के पास में स्थित एक साईकिल की दुकान पर 500 रुपये व अपनी आईडी जमाकर किस्तों में साईकिल खरीदकर घर जाने का फैसला किया। गत बुधवार को साईकिल से 30 से अधिक मजदूर अंबाला, सहारनपुर होते हुए वृहस्पतिवार को शोहरतगढ़ पहुँचे लाख कहने पर भी नहीं रुके न ही खाने की लालसा थी। उनके मन में  बस अपनों से के बीच पहुंचने की तड़प थी। यही आस और विश्वास मजदूरों को अपने परिवार की तरफ खींचती चली जा रही थी। यहां से उनका घर बस 70 किमी रह गया था। सो धन्यवाद कह कर साइकिल का पैडल दबा दिया और बढ़ चले महाराजगंज की ओर।

 

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