नजरियाः इटवा में समीकरण बदले तो बिखर सकते हैं समाजवादी पार्टी के सपने

November 20, 2021 1:05 PM0 commentsViews: 754
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आसान नहीं माता प्रसाद पांडेय की साइकिल यात्रा, समीकरण बदले तो मत विभाजन की शिकार हो सकती है समाजवादी पार्टी

नजीर मलिक


सिद्धार्थनगर। जिले में इस वक्त समाजवादी पार्टी की सबसे मजबूत सीट विधानसभा क्षेत्र इटवा की मानी जा रही है। मुख्य धरा के न्यूज चैनलों ने भी अपनी सर्वे रिपोर्ट में इटवा को जिले में सपा की सबसे मजबूत सीट माना है, जो र्निविवाद रूप से सत्य भी है, मगर राजनीति में ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, इसका अंदाजा लग पाना मुश्किल है। आगे के बदलते हालात चुनावी समीकरण बदल भी सकते हैं , इसलिए कहा जा सकता है कि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय के लिए इटवा में साइकिलिंग उतनी भी आसान नहीं है, जितना कि माना जा रहा है ।

1980 से अब तक हुए दस विधानसभा चुनावों में माता प्रसाद पांडेय छः बार जीत हासिल कर मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष जैसा पद सुशोभित कर चुके हैं। लेकिन चार बार की पराजयों में उनकी अलोकप्रियता के बजाए बदले समीकरण ही मुख्य कारण रहे हैं। इस बार इटवा में माता प्रसाद पांडेय के पक्ष में लोकप्रियता की बयार अभी से चलनी शुरू हो गई है। लेकिन बेहतर हालात के बावजूद किसी नये समीकरण बनने पर माता प्रसाद पांडेय के पक्ष में खतरा खड़ा हो सकता है। तो आइये देखते हैं कि इटवा क्षेत्र में आज के हालात क्या है तथा अगले दो, तीन महीनों में हालात क्या होने की आशंका है।

दरअसल इटवा विधानसभा क्षे़त्र में माता प्रसाद की सियासी ताकत 36 प्रतिशत मुस्लिम, 13 प्रतिशत ब्राह्मण और आठ प्रतिशत यादव मतदाता है। राजनीति में मुस्लिम नेता मुहम्मद मुकीम के पदार्पण के बाद भी इन 36 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों का लगभग आधा भाग माता प्रसाद पांडेय के पक्ष में जाता रहा है। इनमें से कोई भी वर्ग जब उनका साथ छोड़ता है, वह तभी हारते हैं। गत चुनाव में ब्रह्मण और यादव मत उनके साथ से हटा तो हारे ही नहीं बल्कि चुनाव में पहली बार तीसरे स्थान पर खिसक गये। मगर बीते चार सालों में वे पुनः लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गये।

वर्तमान में वे शिखर से नीचे तभी आ सकते हें जब इटवा सीट के समीकरणों में भारी फेर बदल हो। बता दें कि गत चुनाव में बसपा प्रत्याशी अरशद खुर्शीद के मैदान में आने से मुसलमानों का वोट उनके पक्ष से हटने वाला था। मगर उसी समय माता प्रसाद के प्रतिद्धंदी व पूर्व सांसद मुहम्मद मुकीम द्धारा माता प्रसाद के पक्ष में जम कर खड़े हो जाने के कारण उनका मुस्लिम जनाधार खिसकने से बच गया था। मगर अब वहीं मुहम्मद मुकीम अथवा उनके पुत्र इस बार विधानसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी बन सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो अरशद खुर्शीद व मुहम्मद मुकीम के बीच से माता प्रसाद पांडेय कितने वोट निकाल सकेंगे, यह देखने की बात होगी।

पिछली बार यादव मतदाता पूर्व संसद भालचंद यादव के प्रकरण के चलते माता प्रसाद से नाराज थे। मगर अबकी बार वे सपा सरकार बनाने के लिए कटिबद्ध दिखते है। इसलिए वे पूरी तरह माता प्रसाद के पक्ष में ही रहेंगे। लेकिन ब्राह्मण समाज को लेकर भारी संशय है। दरअसल पिछली बार भाजपा ने वर्ष 1980 के बाद पहली बार ब्राह्मण प्रत्याशी सतीश द्धिवेदी पर दांव लगााया था और वह सफल भी रहा। सतीश द्धिवेदी वर्तमान में शिक्षा मंत्री हैं। पिछले पांच सालों में उन्होंने ब्रह्मण समाज में अपनी जड़ें मजबूत की हैं। जाहिर है कि यव विषय माता प्रसाद जी के लिए शुभ संकेत नहीं है।

वैसे सतीश द्विवेदी की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। भाजपा यदि उनके सथाना पर लवकुश ओझा जैसे किसी नये चेहरे पर दांव लगा देगी तो ब्रह्मण मतों में बराबर का बंटवारा हो जाएगा। ऐसी हालत में सपा अथवा माता प्रसाद पांडेय इस सीट को पूरी तरह निरापद नहीं मान सकते। सपा के जिला सचिव कमरुज्जमा खान कहते है कि इस बार पूरे प्रदेश में सपा की आंधी है फिर भी इटवा में सपाई बेहद सजग हैं। चुनाव होने पर माता प्रसाद पांडेय की एतिहासिक जीत की इबारत जरूर लिखी जाएगी।

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