बांसी विधानसभा सीट पर कितनी सफल होगी स्वास्थ्य मंत्री को घेरने की कोशिश?

February 20, 2022 2:17 pm0 commentsViews: 955
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किरन शुक्ला कमजोर, मोनू दुबे में उत्साह अधिक मगर अनुभव की कमी, बसपा के राधेश्याम गंभीरता से लक्ष्य भेदने में लगे

नजीर मलिक

 

 

सिद्धार्थनगर। बांसी विधानसभा में चुनावी लड़ाई दिन बदिन दिलचस्प मोड़ पर पहुंचती जा रही है। वहां भाजपा उम्मीदवार व प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह की मुख्य ताकत ब्राह्मण वोट बैंक पर  तीन तरफ से करारे हमले किये जा रहे हैं। यदि इस वोट में दरार पैदा करने की कोशिश सफल हुई तो जय प्रताप सिंह की अपराजेयता को खंडित किया जा सकेगा, परन्तु सवाल यह है कि क्या वपक्षी उम्मीदवारों द्वारा ब्रह्मण मतों को जय प्रताप सिंह से अलग कर पाना संभव है?

12 प्रतिशत ब्राह्मण तय करेंगे किस्मत

बांसी में विधान सभा क्षेत्र में जिले के सबसे ज्यादा 12 प्रतिशत ब्राह्मण रहते हैं। यदि इनमें भूमिहारों को भी जोड़ दिया जाए तो यह तादाद और भी ज्यादा हो जाती है। 3 लाख 58 हजार मतदाता वाली इस सीट पर अनाधिकृत आंकड़ों के अनुसार विप्र समाज के वोटरों की संख्या करीब 42 हजार बैठती है। इस वोट बैंक पर वर्ष 1989 के चुनाव से आज तक जय प्रताप सिंह का एकाधिकार चला आ रहा है। हालांकि इस दौरान अनेक दिग्गज ब्राह्मण उनके खिलाफ चुनाव में उतरे मगर कोई भी उनके एकाधिकार को तोड़ नहीं सका। यहां तक कि पूर्वांचल के दिग्गज ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनय शंकर तिवारी को भी उनके खिलाफ मैदान में उतारा गया मगर वे भी ब्राह्मण मतों को जय प्रताप से अलग न कर सके। ऐसे में सवाल उठता है कि विपक्षी दलों की ओर से लड़ रहे तीन तीन उम्मीदवार क्या जय प्रताप सिंह के ब्राहमण वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे।

किरन शुक्ला कमजोर प्रत्याशी

बांसी सीट पर भाजपा के प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह के मुकाबले बाकी तीन प्रमुख दलों ने इस बार ब्राह्मण कैंडीडेट उतारा है। भाजपा के राजपूत प्रत्याशी के मुकाबले सपा ने मोनू दुबे, बसपा ने राधेश्याम पांडेय तथा कांग्रेस ने किरन शुक्ला को मैदान में उतारा है। इनमें किरन शुक्ला बहुत कमजोर मानी जा रही है। ऐसे में भाजपा के जय प्रताप सिंह से ब्राह्मण मतों को छीनने का काम बाकी दोनों उम्मीदवार कर रहे हैं।

मोनू दूबे में हौसला अधिक, मगर अनुभव कम

इन दोनों उम्मीदवारों में सपा के मोनू दुबे अभी युवा हैं। उनके साथ युवाओं की फौज तो है मगर कोई एसा ब्राह्मण चेहरा नहीं है जो अपने प्रभाव से इस समाज का वोट खींच सके। मोनू दुबे के अन्य समर्थक और सपा नेता भी दूसरी जातियों के हैं जो ब्राहमणों में अपना प्रभाव नहीं रखते। बावजूद इसके वे ब्राह्मण समाज का कुछ वोट तो अपनी तरफ खीचने में सफल होंगे, मगर इतना नहीं कि जय प्रताप सिंह का सियासी किला दरकाया जा सके। हालांकि मोनू दुबे का दावा है कि वह ऐसा कर सकने में सक्षम हैं। उनका यह दावा कितना खरा है यह वक्त ही बताएगा।

राधेश्याम पांडेय इस काम में जी जान से लगे

अब बचते हैं बसपा प्रत्याशी राधे श्याम पांडेय। स्वाथ्य मंत्री जयप्रताप सिंह के विरोधियों की सारी उम्मीदें उन्हीं पर टिकी है। पांडेय की आर्थिक ताकत बहुत मजबूत है। जिसके कारण क्षेत्र के अनेक प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे उनके साथ दिखते हैं। इसी के सहारे वे अपनी बिरादरी के मतों को तोड़ने में लगे हैं। क्या वे जय प्रताप सिंह से ब्राह्मण वोट तोड़ कर उन्हें  शिकस्त देने का काम कर पायेंगे? इस सवाल के जवाब में उनके समर्थक ओकार नाथ पांडेय कहते हैं कि जय प्रताप सिंह के खिलाफ दशकों की इनकम्बैंसी है। इसके अलावा इस राज में ब्राहृमण समाज का भारी उत्पीड़न हुआ है जिससे समूचे विप्र समाज में आक्रोश व्याप्त है। इस कारण से इस बार ब्राह्मण समाज भाजपा को हराने के लिए कमर कस चुका है। वह बसपा के दलित वोटों के साथ मिल कर इस बार भाजपा को शिकस्त देने का मन बना चुका है।

ऐसा संभव तो है लेकिन बेहद कठिन भी

अब सवाल है कि क्या वाकई ऐसा होने जा रहा हैं? इसके जवाब में कहा जा सकता है कि ऐसा संभव तो है लेकिन कार्य बहुत कठिन है। लगभग तीन दशकों से जय प्रताप सिंह के साथ पूरी मजबूती से खड़ा ब्राह्मण वोटर इतनी आसानी से उन्हें नहीं छोड़़ने वाला है। मगर ब्राह्मण उत्पीड़न की घटनाओं और इनकम्बंसी के तहत बदलाव की बयार इसे संभव बना भी सकती है, लेकिन इसके लिए विपक्ष को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।

 

 

 

 

 

 

 

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