बीजेपी को लेकर बेनकाब हुईं मायावती, अब अखिलेश भाजपा को हराने की बना रहे नई रणनीति

November 1, 2020 12:41 pm0 commentsViews: 330
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नजीर मलिक

वे भी क्या दिन थेे

राज्यसभा चुनाव को लेकर बसपा सुप्रीमों मायावती द्धारा सपा को हराने के लिए भाजपा से हाथ मिलाने की घोषणा के बाद से समाजवादी पार्टी के थिंक टैंक ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर नये सिरे से रणनति बनानी शुरू कर दी है। मायावती की इस घोषणा से सपा जहां मुस्लिम वोटों के विभाजन के खौफ से मुक्त हो गई है वहीं उसने दलित मतों के लिए युवा दलित नायक चंद्रशेखर रावण का उपयोग करने के लिए नया पांसा फेंकने की तैयारी शुरु कर दी है।

बता दें कि हाल में राज्यसभा चुनाव के नामांकन के दौरान बसपा के ७विधायकों के खिलेश खमें में आने की जानकारी के बाद मायावती ने एलान कर दिया है कि भविष्य में वह सपा को हराने की हर संभव कोशिश करेंगी और जरूरत पड़ने पर वह भाजपा से भी हाथ मिलाने से नहीं चूकेंगी।

मुसलमानों के बीच एक्सपोज हुईं मायावती

अपनी इस घोषणा के बाद मायावती मुस्लिम वोटरों की नजर में खुद ही एक्सपोज हो गई हैं। क्योंकि हाल फिलहाल मुस्लिम वोटर किसी ऐसी पार्टी को वोट नहीं देने वाला, जो भाजपा से हाथ मिलाने की बात करती हो।  राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में मायावती का यह एलान समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए विषेष खुशखबरी की तरह है, क्यिकि पहले मुस्लिम मतों को बड़ा हिस्सा बसपा के मुस्लिम कैंडीडेटों के कारण बसपा की तरफ चला जाता था।परंतु मायावती की ताजा घोषणा के बाद माना जा रहा है कि अब ऐसा न हो सकेगा।

दलित मतों पर सपा की नई रणनीति

मुस्लिम मतों की ओर से निश्चिंत होकर अखिलेश यादव ने अब अब अपनी रणनति दलित वोटों को लेकर बनानी शुरू कर दी है। जानकार बताते हैं कि इसके लिए अब उन्होंने मायावती के कट्टर राजनीतिक विरोधी और तेजी से उभरते हुए दलित नेता चंद्रशेखर रावण की तरफ लगाया है। समाजवादी थिंक टैंक का मानना है कि चन्द्रशेखर आज यूपी के दलित मतों में छोटी ही सही मगर एक ताकत के रूप में उभरे हैं। इसलिए पश्चिमी यूपी में उन्हें एक दर्जन सीटों पर समर्थन देकर पूरे प्रदेश के दलित वोटों में से कुछ मत हासिल किए जा सकते हैं।

इस खेमे का मनना है कि पूरे स्लिम के अलावा दलितों में सेेंंधमारी के बाद परम्परागत पिछड़ों और नाराज ब्रहमण मतों व बेरोजगारी से उत्पन्न युवा आक्रोश को अपने खेमे में लाकर पटखनी दी जा सकती है।फिलहाल तो कागजों पर यह रणनीति तो सटीक लगती है, मगर सवाल है कि क्या इस रणनीति को सपा अमली जामा पहना सकती है। यदि वह ऐसा कर सकी तो उत्तर प्रदेश में बड़ा बदलाव ला पाने में सफल हो सकती है।

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