क्रांतिकारी आंदोलन के अगुआ थे चंद्रशेखर आजाद, पढ़िये उनके “शहादत दिवस” 27 फरवरी पर इंकलाबी सलाम

February 27, 2020 3:44 pm0 commentsViews: 322
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(आज भारत की आज़ादी की लड़ाई के अगुआ चंद्रशेखर आजाद का शहादत दिवस है . इस मौके पर इस महान क्रांतिकारी को याद करते हुए प्रस्तुत है इंद्रेश मैखुरी का यह लेख)

अजीत सिंह

सिद्धार्थनगर। 27 फरवरी भारत के स्वतन्त्रता संग्राम की क्रांतिकारी धारा के प्रमुख नायक चन्द्रशेखर आजाद का शहादत दिवस है। इसी दिन 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब आजाद पार्क) में अंग्रेजों से आमने-सामने के मुक़ाबले में आजाद की शहादत हुई थी। सन् 1930 और 1931 भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के शहादत के वर्ष हैं, जिसमें भारतीय क्रांति और देश की आजादी के सुस्पष्ट लक्ष्य को समझने और व्याख्यायित करने वाले क्रांतिकारियों की शहादतें हुई। 28 मई 1930 को भगत सिंह और उनके साथियों को छुड़ाने की योजना के तहत बम का परीक्षण कर रहे भगवती चरण वोहरा की शहादत हुई, 27 फरवरी 1931 को आजाद और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत हुई।

23 जुलाई 1906 में जन्मे चंद्रशेखर के “आजाद” होने की कथा तो किवदंती की तरह प्रचलित है। सन् 1921 में 15 वर्ष की आयु में असहयोग आंदोलन के दौरान चन्द्रशेखर गिरफ्तार हुए तो मजिस्ट्रेट के पूछने पर उन्होंने अपना नाम- आजाद, पिता का नाम-स्वाधीनता और घर-जेलखाना बताया था। यह अलग बात है कि क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक होने के बाद न तो वे कभी गिरफ्तार हुए और ना ही जेल गए थे।

चन्द्रशेखर आजाद, भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की दो पीढ़ियों के साथ काम करने वाले नेता थे। वे 1922 में क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक हुए थे, जब इस आंदोलन के नेता रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़उल्ला खान आदि थे। भगत सिंह वाली पीढ़ी क्रांतिकारी आंदोलन की अगली पीढ़ी थी जिसके साथ आजाद ने काम किया था। सन् 1925 में काकोरी कांड के बाद हुई धरपकड़ और गिरफ्तारियों में जो लोग पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े आजाद उनके अगुवा थे। पुलिस को छकाने का यह सिलसिला आजाद के जीवन पर्यंत चला।
आजाद वेश बदलने और भूमिगत हो जाने की कला में माहिर थे। विश्वनाथ वैशम्पायन द्वारा लिखित पुस्तक- अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद (सुधीर विद्यार्थी द्वारा संपादित, राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित) में आजाद के जीवन के विविध पहलुओं पर तफसील से चर्चा हुई है। उसी में उनके विभिन्न रूप बदलने और अलग-अलग जगह शेल्टर बनाने के कई किस्से हैं। क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए आजाद ने ट्रक ड्राईवर से लेकर सन्यासी तक के कई वेश धरे और मठों से लेकर राजमहलों तक को अपना आश्रय स्थल बनाया।

आजाद क्रांतिकारी दल के सेनापति थे लेकिन बम-पिस्तौल चलाने वालों का यह दल हत्यारों का नहीं क्रांतिकारियों का दल था जो मानव जीवन का मोल समझता था। यह बात भगत सिंह ने अदालत में गवाही के दौरान कही थी। आजाद भी इस बात को मानते थे। विश्वनाथ वैशम्पायन के अनुसार एक राज्य के सरदार ने आजाद के सामने प्रस्ताव रखा कि राजा को समाप्त करने में आजाद यदि सरदार की मदद करें तो काफी सारा धन हासिल होगा। आजाद ने इस प्रस्ताव को सिरे से नकारते हुए कहा “हमारा क्रांतिकारियों का दल है, हत्यारों का नहीं। पास में पैसे हों या न हों, हम भूखे पकड़े जा कर फांसी पर भले ही लटक जाएँ, परंतु पैसे के लिए ऐसा घृणित कार्य नहीं कर सकते.”

विश्वनाथ वैशम्पायन, मन्मथनाथ गुप्त और शिव वर्मा ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि आजाद की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं हुई थी. लेकिन अध्ययनशीलता उनमें काफी थी। भगत सिंह, भगवती चरण वोहरा आदि तो काफी पढ़े-लिखे थे, जिनकी अंग्रेजी पर खूब पकड़ थी। ये दल के सिद्धांतकार भी थे। वैशम्पायन ने लिखा है कि आजाद पहले औरों से अंग्रेजी में लिखा हुआ पढ़वाते थे और फिर उसका अर्थ समझते थे। बाद में अभ्यास से वे खुद भी अंग्रेजी पढ़ना सीख गए थे। शिव वर्मा ने “संस्मृतियाँ” नामक पुस्तक में लिखा “कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट घोषणापत्र दूसरी बार आदि से अंत तक मैंने आजाद को सुनाते समय ही पढ़ा था।” बम-पिस्तौल चलाने से लेकर अंग्रेजी सीखने तक सारे काम अपने उद्देश्य के लिए ये क्रांतिकारी युवा उस दौर में कर रहे थे।

भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के दल की हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से लेकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन तक की यात्रा के आजाद अग्रणी नेता थे। बिस्मिल के समय से दल का नाम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था।  7-8 सितंबर 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में देश भर के क्रांतिकारियों की बैठक में भगत सिंह ने दल का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन करने का प्रस्ताव रखा। भगत सिंह का तर्क था कि दल के नाम में उसका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए. चंद्रशेखर आजाद उस बैठक में उपस्थित नहीं थे। नाम परिवर्तन पर आजाद की प्रतिक्रिया का उल्लेख करते हुए वैशम्पायन ने लिखा है, “आजाद इस परिवर्तन से पहले चौंके अवश्य लेकिन चर्चा के बाद वह परिवर्तन उन्होंने स्वीकार कर लिया। वे यही सोचते थे कि रिपब्लिकन शासन व्यवस्था में समानाधिकार का अधिकार तो निहित होगा ही परंतु चर्चा के बाद उन्हें यह समझते देर न लगी कि रिपब्लिकन शासन व्यवस्था में तो यह संभव है कि गोरी नौकरशाही के स्थान पर काली नौकरशाही स्थापित हो जाये तथा पूंजीपति अपना प्रमुख प्रभुत्व स्थापित करके जन साधारण का शोषण करता रहे। इसलिए जिस जनता की शक्ति पर स्वतन्त्रता प्राप्त होगी उसे सुस्पष्ट शब्दों में विश्वास दिलाना अनुचित न होगा और यह विश्वास दल के नाम में समाजवादी शब्द जोड़कर ही दिलाया जा सकता है।” इस बैठक के बाद ही दल को सैन्य विभाग और संगठन विभाग में बांटा गया और आजाद सैन्य विभाग यानि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सेनापति बनाए गए।

27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में जिस पेड़ के पीछे से आजाद अंग्रेजों का मुक़ाबला करते हुए शहीद हो गए। उस पेड़ पर लोगों ने आजाद लिख दिया। पार्क को विश्वविद्यालय के छात्रों ने आजाद पार्क कहना शुरू कर दिया। लोग उस पेड़ के नीचे फूलमाला चढ़ाने लगे तो अंग्रेजों ने वह पेड़ ही कटवा डाला। बाद में वहाँ पर पुनः जामुन का पेड़ लगाया गया। देश आजाद हो गया, अलबत्ता आजाद और उनके साथियों के सपनों का देश बनना अभी बाकी है। इस चुनौती को कबूल करना होगा कि आजाद और उनके साथियों के सपनों का देश बनाया जाये।

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