डुमरियागंज संसदीय सीटः अमर सिंह की  चुनौती और सपा-भाजपा का संकट

May 6, 2024 2:03 PM1 commentViews: 1942
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नजीर मलिक

सिद्धार्थनगर। जब तक यह राइट अप आपके सामने पहुंचेगा, शोहरतगढ़ क्षेत्र के पूर्व विधायक चौधरी अमर सिंह आजाद समाज पाटी (कांशीराम) यानी चन्द्रशेखर रावण की ओर से डुमरियागंज  संसदीय सीट से पर्चा दाखिल कर चुके होंगे। उनके नामांकन करने से डुमरियागंज सीट के समीकरण यकीनन बदल जायेंगे। इससे किसको कितना फायदा या नुकसान होगा यह बाद की बात है। मगर यह लड़ाई पहले दिन से ही त्रिकोणीय बन जायेगी, ऐसा तमाम सियासी जानकारों का मानना है।

चौधरी अमर सिंह गत विधानसभा चुनावों में भाजपा के सहयोगी अपना दल से विधायक चुने गये थे। बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी। फिलहाल वे बसपा से टिकट मांग रहे थे, मगर कहा जा रहा है कि एक बड़े राजनीतिज्ञ के इशारे में कुछ स्थानीय बसपाई नदीम मिर्जा को टिकट दिलाने में सफल हो गये। लेकिन जिद ऐसी कि अमर सिंह बसपा से न सही उसके छोटे भाई के रूप में नवगठित सियासी दल और चन्द्रशेखर की ‘आजाद समाज पार्टी’ (कांशीराम) से टिकट लेकर ही माने। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब क्या होगा? क्या अमर सिंह की चुनावी भूमिका वोट कटवा की होगी अथवा वह चुनाव में प्रभावी प्रत्याशी साबित होगे या फिर वह किसी राजनीतिक दल का नुकसान करेंगे?

सपा का खतरा

अमर सिंह लगभग सात हजार मतदाताओं वाली ग्राम सभा कपिलवस्तु के ग्राम प्रधान रहे हैं। मुस्लिम बाहुल्य इस ग्राम सभा के मुस्लिम मतदाताओं पर उनका प्रभाव है। इसके अलावा शोहरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में भी मुसलमानों पर उनका प्रभाव देखने को मिल जाता है। इस सीट पर मुस्लिम मत 26 प्रतिशत है। इसमें यदि वे विभाजन कर पाने में सफल हुए तो समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के लिए सरदर्द बन सकते हैं। अब देखना है कि अमर सिंह इसमें कितना कामयाब हो सकते है।

भाजपा का संकट

अमर सिंह फिलहाल सबसे बड़ा संकट भाजपा के लिए बन सकते हैं। डुमरियागंज संसदीय सीट पर अमर सिंह के सजातीय अर्थात कुर्मी मतदाता की तादाद 9 प्रतिशत यानी 1.80 लाख है। यदि कुर्मी समाज अमर सिंह के पीछे लामबंद होता है तो अमर सिंह तत्काल लड़ाई में आ जायेगे। क्यों कि  चन्द्रशेखर अजाद समर्थक दलित मतदाता और बसपा के बड़े वर्ग का मतदाता जो अपने उम्मीदवार के खिलाफ है और अमर सिंह के पीछे लामबंद हो रहा है। यह समीकरण भाजपा प्रत्याशी जगदम्बिका पाल के लिए चिंता का विषय है। क्यों कि कुर्मी मतदाता सिद्धार्थनगर में भाजपा समर्थक माना जाता है।

अमर सिंह की चुनौती

फिलहाल अमर सिंह की पहली चुनौती अपने सजातीय कुर्मी मतदाताओं को अपने साथ जोड़ना है। क्योंकि इन दोनों समुदायों खास कर मुसलमानों की पहली प्राथमिकता भाजपा को हराना है। ऐसे में जब तक कुर्मी वोटर अमर सिंह के साथ खड़ा नहीं होगा तब तक दलित और मुस्लिम मतदाता उनके साथ खड़ा होने से परहेज करेगा। वह अमर सिंह के मजबूत दिखने की दशा में ही उनके साथ जाना पसंद करेंगा। ऐसे में अमर सिंह को मजबूत बनाने के लिए उनके सजातीय समाज को खुल कर आगे आना पड़ेगा, तभी मुस्लिम और दलित उनके साथ आगे आने का काम करेगा।  कुल मिला कर अब यह अमर सिंह के ऊपर है कि भविष्य में उनकी रणनीति कितनी प्रभावी होगी तथा वह तीनों वर्गो के मतदाताओं को जोड़ कर चुनावी जंग को कहां तक ले जा सकेंगे।

 

 

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