विनय शंकर तिवारी के कफिले से चिल्लूपार के चुनावबाजों के माथे पर गहरी शिकन

February 23, 2016 1:44 PM0 commentsViews: 1996
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विशेष संवाददाता

tiwari

गोरखपुर। बसपा के वरिष्ठ नेता और पूर्वांचल के सियासी दिग्गज पंडित हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी ने गोरखपुर के चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र का दौरा कर वहां के कई सक्रिय सियासतदानों के माथे पर शिकन डाल दिया है। उनके इस दौरे के मायने को लेकर चिल्लूपार के सियासी गलियारे में बहस ‘शुरू हो गई है।

विनय शंकर तिवारी के काफिले ने कल पूरी ताकत से चिल्लूपार क्षेत्र में अपना कारवां उतारा। पिरहानी, खरसारी, रामगढ़, देवरा पटना, नरहरपुर, साउखोरे आदि गांवों में उन्होंने लोगों से मुलाकात की। लोगों की समस्याएं जानी, उनकी दिक्कतों पर बातचीत की। समस्याओं के हल करने का वायदा भी किया।

उनके साथ चल रहे काफिले में पारस पांडेय, शिव प्रसाद तिवारी, मकबूल अहमद, सत्यराम दुबे, अमीर यादव आदि ने मुलाकातों और चर्चाओं के दौरान बड़ी बारीकी से विधानसभा क्षेत्र के सियासी हालात पर लोगों की राय भी ली।

लगभग एक दर्जन गांवों में उनके दौरे के बाद उस विधानसभा क्षेत्र के चुनावी अखाड़ेबाजों के कान खड़े हो गये हैं। चिल्लूपार के सियासी गलियारों मे पंडित विनय शंकर तिवारी के चिल्लूपार दौरे को लेकर बहस मुबाहिसा शुरू हो गया है।

हालांकि चिल्लूपार उनका पुश्तैनी गांव है, लेकिन पंडित हरिशंकर तिवारी के बेटे कुशल तिवारी और विनय तिवारी में से किसी ने कभी यहां से कोई चुनाव नहीं लड़ा। यह जरूर है कि पूरा तिवारी कुनबा अपने इलाके के सरोकारों से हमेशा जुड़ा रहा, लेकिन विनय शंकर तिवारी के ताजा दौरे ने वहां एक चर्चा को जन्म दे दिया है।

इलाके के जानकारों का कयास है कि जिस तरह उन्होंने काफिले के साथ निकल कर कई गांवों के प्रमुख और प्रभावशाली लोगों से मुलाकात की है, उसके सियासी मायने तो निकलते ही हैं। उनका मानना है कि विनय शंकर यहां से चुनाव ल़ड सकते हैं।

हालांकि बसपा ने इस इलाके से अभी तक प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है, मगर जानकारों का मानना है कि विनय शंकर तिवारी ने इस क्षेत्र को लेकर कोई मंसूबा बना लिया है। चिल्लू पार के एक किसान राजिंदर का कहना है कि अगर तिवारी जी के परिवार का कोई आदमी यहां से चुनाव लड़ेगा, तो यहां के चुनावी समीकरण यकीनन बदल जायेंगे। उस परिवार की जड़ें यहां काफी गहरी हैं।

फिलहाल तो विनय शंकर तिवारी के करीबियों ने इसे अपनी मिट्टी से जुड़ने की एक कोशिश बताया है, जो तिवारी परिवार सदा करता है, लेकिन राजनीतिक समझ रखने वाले इसे मानने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि इस इलाके से चुनाव ल़डने की मंशा रखने वालों के माथे पर गहरी शिकन दिखने लगी है।

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