कुशल तिवारी क्यों हारे, चुनावी जंग में कौन-कौन बना ‘मीरजाफर’ किसने की दगाबाजी

June 6, 2024 2:04 PM0 commentsViews: 3556
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सिद्धार्थनगर। डुमरियागंज संसदीय सीट जातीय समीकरण पूरी तरह सपा के पक्ष में होने के बावजूद भाजपा प्रत्याशी जगदम्बिका पाल ने अपने रणनीतिक कौशल से जिस प्रकार बाजी पल्टी वह रोमांचक है। यह उनके राजनीतिक चातुर्य का ही फल रहा  कि  डुमरियागंज में सपा की जातीय समीकरण साधने की रणनीति कामयाब नहीं हो सकी। जिसके कारण यहां  मुस्लिम, यादव व ब्राह्मण वोटरों के सहारे सपा से चुनाव में उतरे भीष्मशंकर उर्फ कुशल तिवारी को हार का सामना करना पड़ा। इस हत प्रभ करने वाली हार को लेकर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ जन अभी तक मंथन में जुटे हैं कि आखिर चूक कहां और कैसे हुई।

सपा की सियासी गणित थी मजबूत

26.5 फीसदी मुस्लिम  और 9 फीसदी यादव आबादी वाली डुमरियागंज सीट पर इस बार जीत का सिल सिला कायम रखना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती थी। इस सीट पर जीत चौका लगा चुके भाजपा प्रत्याशी जगदंबिका पाल की  भाजपा की चुनावी गणित उस समय और उलझ गई, जब गठबंधन की ओर से सपा प्रत्याशी के रूप में भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी के नाम की घोषणा कर दी गई। लगभग 11 फीसदी ब्रह्मण वोटरों वाली लोकसभा  क्षेत्र में बड़े ब्रह्मण चेहरे के चुनावी मैदान में उतरने से सियासी तापमान सातवें आसमान पर पहुंच गया। मुस्लिम, यादव के अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ ब्राह्मण मतों को अपने पाले में लाकर सपा, चुनावी गणित बैठाने में जुट गई। बसपा की ओर से कमजोर प्रत्याशी के मैदान में होने से सपा संविधान बचाने की बात कहकर दलित वोटरों को भी साधने लग गई। मजबूत जातीय समीकरण और घेराबंदी को तोड़कर जीत का सिल सिला कायम रखना इस बार भाजपा प्रत्याशी के लिए आसान न था।

पाल ने सूझ बूझ से सुलझाया गणित

मगर राजनीति के मंझे खिलाड़ी माने जाने वाले जगदंबिका पाल अपने राजनीतिक कौशल से इस कठिन घेराबंदी को तोड़ने की मुहिम में सूझ बूझ के साथ लगे।  मोदी-योगी के काम के सहारे जनता के बीच जाने के साथ अपने ही पार्टी के रूठे कार्यकर्ताओं को मनाने में सफल हुए। हालांकि कई बड़े नेता अंत तक उनका असहयोग ही करते रहे।  रूठे साथियों और अन्य दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए  सांसद पाल ने कभी भाजपा के साथ रहे और विधानसभा चुनाव लड़ चुके नेता हरिशंकर सिंह, राजू श्रीवास्तव की घर वापसी कराई। इसके अलावा सपा नेता रामकुमार उर्फ चिंकू यादव, कांग्रेस के सच्चिदानंद पांडेय, बसपा के अशोक त्रिपाठी और पिछले चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके डॉ. चंद्रेश उपाध्याय को भाजपा में शामिल कराने में कामयाब रहे। उनकी सबसे बड़ी कामयाबी कई मुस्लिम चेहरों को अपने व्यक्तिगत समर्थन में लाकर मिली। । जिसके कारण पाल को डुमरियागंज,  कपिलवस्तु व शोहरतगझढ विधानसभा क्षेत्र में उन्हें कुछ हजार मुसलमानों का वोट भी मिल गया।

मुसलमानों को अपने पक्ष में लाते रहे पाल

इसके अलावा सांसद पाल जिले के दर्जनों मुस्लिम ग्राम प्रधानों और पूर्व प्रधानों का साथ पाने में सफल रहे। ग्राम प्रधान वजहुल कमर, प्रधान प्रतिनिधि मो. सईद आदि इसके उदाहरण हैं। दूसरी तरफ बसपा से तीन बार चुनाव लड़ चुके एक मजबूत मुस्लिम राजनीतिज्ञ भी नौगढ़ और शोहरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में अपने समर्थकों को भाजपा के खेमे में भेजते रहे। नतीजे में बर्डपुर नम्बर 11 व 12  और महदेइया जैसे सपा समर्थक बड़े मतदान केन्द्रों पर भाजपा को भारी मत मिला। समाजवादी पार्टी के एक मुस्लिम नेता जो सपा के प्रचार में लगे रहे आखिरी क्षणों में वे भी पाल की मदद करते देखे गये। मुख्यालय के एक मुस्लिम सभासद तो अपने वार्ड में महिलाओं की मीटिंग करा कर उन्हें भाजापा के पक्ष में वोट डालने के लिए प्रेरित करते दिखे। मुसलमान के नाम पर राजनीति करने वाले इन बिकाऊ मुस्लिम नेताओं ने चंद पैसों के लिए भाजपा के पक्ष में काम कर अपनी भूमिका ‘मीरजाफर’ की बना डाली। शोहरतगढ़ के एक गैर मुस्लिम सपा नेता भी खुल कर भाजपा के लिए काम करते रहे।

सजातीयों ने की प्रत्यशी से दगा

सपा प्रत्याशी कुशल तिवारी का समीकरण बिगाड़ने में ब्राहमण वर्ग का बड़ा हाथ रहा। रसियावल जैसे कुछ गिने चुने बूथों को छोड़ कर तो केवल सदर विधानसभा क्षेत्र के अधिकांश बूथों पर सपा बुरी तरह हारी। बूड़ा, खैराटी, झागंटी, फुटुक,  मुड़िली, पननी, भुसौला, बरवा सैनुआ, मदनपुर, महुलानी आदि कई दर्जन ब्राह्मण प्रभाव वाले मतदान केन्द्रों पर सपा बुरी तरह हारी। ऐसा ही खेल सभी विधानसभा क्षेत्रों में हुआ। जबकि इन्हीं मतों के सहारे सपा की जीत का समीकरण बनता दिख रह था।  इन क्षेत्रों के प्रभावशाली ब्राह्मण सपा के लिए शुरू में लगे भी थे। लेकिन इसे सपा की सांगठनिक कमजोरी कहें या भाजपा प्रत्याशी जगदम्बिका पाल का राजनीतिक चातुर्य, जिन्होंने अंतिम दो दिनों में ब्राहमण समाज के अनेक प्रभावशाली चेहरों को येन केन प्रकारेण अपने पक्ष में मोड़ कर सपा का मुस्लिम, यादव व ब्राह्मण समीकरण छिन्न-भिन्न कर डाला।

सपाई निकले गैर जिम्मेदार

दर असल इसकी सारी जिम्मेदारी समाजवादी पार्टी के विधानसभा क्षत्रपों को दी जाए तो गलत नहीं होगा। सपा की जिले की डुमरियागंज की विधायक सैयदा खातून अपनी विधनसभा क्षेत्र में हो रही गड़बडियों को रोक पाने में विफल रहीं। जबकि उनको पूरे साधन और संसाधन उपलब्ध कराये गये थे। प्रदेश के सबसे बड़े नेताओं में से एक व इटवा के विधायक माता प्रसााद  के क्षेत्र में भी सपा को उतने वोटनही मिल सके, जितनी कि उनसे अपेक्षा की जा रही थी।  जिलाध्यक्ष व पूर्व विधायक लालजी यादव बांसी के ही हैं। बांसी क्षेत्र में उनकी व गत विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी मोनू दुबे भी अपने कृत्यों से क्षेत्र में आलोचना के केंन्द्र बने हुए हैं। कपिलवस्तु विधनसभा क्षेत्र के प्रत्याशी और पूर्व विधायक विजय पासवान का होने और न होने पर चर्चा ही निरर्थक है। यादवों पर ज्यादा चर्चा इसलिए नहीं कि उन्होंने टिकट के दो-दो संभावित यादव दावेदारों के विरोध के बावजूद यादवों ने 50 फीसदी वोट सपा के पक्ष में डाला। इससे पहले भी किसी भी चुनाव में गैर यादव उम्मीदवारों को 60 फीसदी से अधिक यादव मत नहीं मिलता था। इस बार भी अगर उन्होंने ऐसा किया तो आश्चर्य कैसा?

 

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