कभी रहती थी यहां अंग्रेजों की धमाचौकड़ी, अब सिर्फ वीरानी में तब्दील हैं ये एतिहासिक हवेलियां

January 2, 2026 8:22 PM0 commentsViews: 337
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अजीत सिंह

जीर्ण शीर्ण अवस्था में बर्डपुर हवेली

सिद्धार्थनगर। वर्ष 1844 में अलीदापुर क्षेत्र के जमींदार और गोरखपुर के तत्कालीन कमिश्नर पेपे, बर्डपुर स्थित कोठी के तत्कालीन मालिक और गोरखपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी रहे मिस्टर बर्ड से जुड़ी कहानियों को यह हवेलियां आज भी बयां कर रही हैं। इसे संवारने की पहल डीएम राजागणपति आर ने की थी जिससे जिले वासियों को  लगा था वर्ष 2026 में यह हवेली फिर से जगमगाएगी मगर कुछ टेक्निकल दिक्क़त आने से टेंडर निरस्त हो गया।

हम आपको बता दें कि अंग्रेजों ने अवध की सत्ता हड़पने से पूर्व उत्तर में अनेक जमींदारी प्रथा स्थापित की थी। जिनमें बर्डपुर, नेउरा ग्रांट, दुल्हा कोठी, अलीदापुर, सरौली प्रमुख रही। बर्डपुर कस्बे का नामकरण आज भी अंग्रेज जमींदार आरएन बर्ड (जो 1829 में गोरखपुर के कमिश्नर थे) के नाम से जाना जाता है।

बर्डपुर वास्तव में अंग्रेज जमींदारों की रियासत थी, जिसमें 14 मौजे थे। आज भी इन मौजों को इनके क्रमांक से जाने जाते हैं। बर्डपुर स्टेट की स्थापना 1832 में की गई थी। जेजे मैकलाचलन इसके जमींदार थे। इनका स्वामित्व 50 वर्ष के लिए एलेक्जेंडर एंड कंपनी कोलकाता को सौंपा गया, पर यह फर्म पट्टे की शर्त को पूरा नहीं कर सकी।

एक मार्च 1934 में यह संपत्ति डब्लू एफ गिब्बन और के काका को बेच दिया। वर्ष 1948 में रियासत का प्रबंध देख रहे एच. गिब्बन की मृत्यु हो गई। उसके एक वर्ष तक उनकी पत्नी ने प्रबंध संभाला। मिसेज गिब्बन ने डब्लू पेपे को रियासत का प्रबंधक बनाया और बाद में फिर उन्हीं से शादी कर ली। बर्डपुर स्टेट के स्वामियों की अंतिम पीढ़ी थी।

दोनों भवनों की देखरेख बर्डपुर और दुल्हा कोठी को क्रमश: सिंचाई और लोक निर्माण विभाग ने अपने कब्जे में ले रखा है। कभी इन भवनों में अंग्रेजी शासकों और जमींदारों की शान में कसीदे पढ़े जाते थे। मौजूदा समय में इन भवनों की दशा जर्जर हो गई है। जिले के वरिष्ठ पत्रकार इतिहासकार नज़ीर मलिक कहते हैं कि इतिहास के साक्षी रहे भवनों को सुरक्षित और संरक्षित करने का काम हो रहा है, पर जिले में ऐतिहासिक हवेलियों पर किसी की नजर नहीं है।

बर्डपुर हवेली को संवारने का जिम्मा डीएम राजा गणपति आर. ने नगर पंचायत कपिलवस्तु को 2025 में दिया था मगर कुछ टेक्निकल प्रॉब्लम होने की वजह से इस हवेली को पुनः सिंचाई विभाग को हस्तांत्रित कर दिया गया और वीरान हवेली के जगमगाने का लौटा समय फिर वापस अंधेरे में चला गया।

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