जानिए, मरहूम अयातुल्लाह खुमैनी के दादा यूपी के किस गांव के निवासी थे?

June 8, 2017 12:28 PM0 commentsViews: 1858
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नजीर मलिक

khomaini

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी का किन्तूर गांव यों तो उत्तर प्रदेश के बाक़ी गांवों की मानिंद चुपचाप सा रहता है, लेकिन बीते 4 जून को इस गांव में उदासी का डेरा जरूर रहा। उदास होता भी क्यों नहीं आखिर इसी गांव का पोते और इरान के राष्ट्राध्यक्ष रहे मरहूम आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी  4 जून 1989 को इंतकाल जो कर गये थे।

बाराबंकी के किन्तूर गांव की धड़कनों का तेज़ होना शायद इसलिए वाजिब था क्योंकि ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रवर्तक अयातुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी के दादा सैय्यद अहमद मूसवी हिंदी, सन 1790 में, बाराबंकी के इसी छोटे से गांव किन्तूर में ही जन्मे थे। रूहुल्लाह ख़ुमैनी के दादा क़रीब 40 साल की उम्र में अवध के नवाब नसीरुद्दीन हैदर  के साथ धर्मयात्रा पर इराक गए और वहां से ईरान के धार्मिक स्थलों की ज़ियारत की और  फिर वे ईरान के ख़ुमैन नाम के गांव में जा बसे।

उन्होंने फिर भी अपना उपनाम ‘हिंदी’ ही रखा। उनके पुत्र आयतुल्लाह मुस्तफ़ा हिंदी का नाम इस्लामी धर्मशास्त्र के जाने-माने जानकारों में शुमार हुआ। उनके दो बेटों में, छोटे बेटे रूहुल्लाह का जन्म सन 1902 में हुआ, जो आगे चलकर आयतुल्लाह ख़ुमैनी या इमाम ख़ुमैनी के रूप में प्रसिद्ध हुए।

अयातुल्लाह खुमैनी ने 1979  में ईरान से अमेरिका पिट्ठू शाह रजा पहलवी का शासन उखाड़ फेंका था। इसी के साथ वहां से राजशाही का खात्मा हुआ था। उसके बाद वे ईरान की सर्वोच्च सत्ता के केन्द्र बने। 4 जून 1989 को उनका इंतकाल हुआ। उन्हें विश्व में शिया सुन्नी एकता के अलमबरदार के रूप में जाना जाता है।

कुछ जानकार बतातें हैं कि इमाम खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसवी का डुमरियागंज के हल्लौर व बलरामपुर के उतरौला से भी रिश्ता था, और वह कई बार यहां आये भी थे। लेकिन स्थानीय विद्धतजन इस बारे में कोई जानकारी नहीं रखते।

 

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