माता प्रसाद पांडेय के खिलाफ बयान पर दीपक मिश्रा ने ओमप्रकाश राजभर को लताड़ा
— जनेश्वर मिश्र व बृजभूषण तिवारी की परंपरा के अनमोल मोती हैं, माता प्रसाद पांडेय
नज़ीर मलिक
सिद्धार्थनगर। यूपी असेम्बली के नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय पर भाजपा से मिले होने के मंत्री ओमप्रकाश राजभर के आरोप की भर्त्सना करते हुए समाजवादी चिंतक दीपक मिश्रा ने राजभर को लताड़ते हुए उन्हें पत्र लिख कर कड़ी नसीहत दी है।
मंत्री ओमप्रकाश राजभर को लिखे पत्र में दीपक मिश्रा ने लिखा है कि- ‘संज्ञान में आया कि आपने सार्वजनिक वक्तव्य दिया है कि नेता प्रतिपक्ष श्री माता प्रसाद पाण्डेय भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं। आप का यह वक्तव्य अतिरंजित, अनावश्यक, अमर्यादित, अराजनीतिक, आधारहीन और आपत्तिजनक है, जिससे आपकी दुराग्रही – दुर्बद्धिपूर्ण अज्ञानता प्रतिध्वनित होती है। आपके ऐसे बयानों से उत्तर प्रदेश सरकार, आपके दल और समग्रतः राजनीति, तीनों की स्थिति हास्यास्पद हुईं है।
आप से आग्रह है कि ऐसी उलूल- जलूल बोली बोलकर बार बार अपनी और सरकार का मज़ाक न उड़वाया करें। आप तो सरकार के लिए सिद्धांतहीन आवागमन के हेतु कुख्यात हैं, कम से कम कुछ लोग जो आज भी विचार धारा को जीने वाले कातिबद्ध राजनीतिज्ञ हैं, कम से कम उन्हें तो अपनी कटुक्तियों से बख्शे रहें।
सर्व विदित है कि माता प्रसाद जी पूज्य जनेश्वर मिश्र और ब्रजभूषण तिवारी जी की परम्परा के अनमोल मोती हैं जिन्होंने सत्ता के लिए आपकी तरह कभी दल और खेमा नहीं बदला। वे यदि नीतिश कुमार जी की भांति जार्ज फ़र्नान्डीज़ जी के साथ एनडीए में चले गए होते तो आज जिन पदों को आप सोच नहीं सकते, उन्हें कब का शोभित कर चुके होते। सिद्धार्थनगर के माधव प्रसाद त्रिपाठी जी द्वारा भाजपा में उन्हें लाने की कोशिश अनेकों बार असफल रही जो भाजपा के उत्तर प्रदेश के संस्थापक अध्यक्ष रहे।
क्योंकि आपका सैद्धांतिक राजनीति से कोई सरोकार नहीं है इसलिए आप संभवतया माधव बाबू को नहीं जानते होंगे, न ही आप में वह समझ और सलाहियत हो सकती है जिससे माता बाबा जैसी विभूतियां अनुभूत होती हैं। श्रद्धेय अटल जी भी उनकी समाजवाद और सामाजिक न्याय में अटल आस्था नहीं डिगा सके। उन्होंने कभी भी कैश, कास्ट और करप्शन की स्वार्थी व स्वकेंद्रित सियासत नहीं की जिसके आप सिद्ध प्रतीक-पुरुष हैं।
माता प्रसाद जी जैसे लोग जिसके साथ होते हैं, उसी के साथ हर हाल में होते हैं। पहले महान लोहिया, फिर चौधरी चरण सिंह, तत्पश्चात नेताजी मुलायम सिंह यादव और अब श्री अखिलेश यादव, सोशलिस्त पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी तक, उन्होंने पिछड़ों और दलितों की आवाज बिना किसी सौदेबाजी के सशक्त किया और समाजवाद व सामाजिक न्याय के अलावा न कुछ देखा, न सोचा।
विनम्र निवेदन है कि आप उन्हें और उनके जैसे लोगों को अपनी तंग नज़र या कमनिगाही से न देखें। अस्तु, यस्य भावना यादृशी, दृष्टि भवति तादृशी, इसी उक्ति को महर्षि तुलसी ने यूं कहा है – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु सूरत देखी तिन तैसी
खैर……
जो भी देखेगा अपनी ही नज़र से देखेगा
किसी जर्रे को समंदर नज़र आए कैसे
पिछड़ों और दलितों के सर्वतोन्मुखी सम्मान सह सशक्तिकरण के लिए सम्पूर्ण जीवन देने वाले माता प्रसाद जी के लिए आपका ऐसा बोलना दुःखद, दुर्भावना व दुर्भाग्यपूर्ण है।
आग्रह है कि आगे ऐसे कथन बोलकर अपने को लांछित नहीं करेंगे और लोक जीवन में संवाद की शुचिता व मर्यादा का ध्यान रखेंगे।





