वार्ड नम्बर 46–सईद भ्रमर से सीखिए कैसे होती है चुनावी राजनीति

October 4, 2015 5:29 PM0 commentsViews: 335
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नजीर मलिक

मोहाना बाजार में विशाल जनसभा को संबोधित करते पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सईद भ्रमर

मोहाना बाजार में विशाल जनसभा को संबोधित करते पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सईद भ्रमर

जिला पंचायत के चुनाव में तमाम नये रंगरूट उतरे हुए हैं। क्या तरीका है, उनके वोट मांगने का? बस, लोगों से मिलो, हाथ जोड़ो, पैर छू के प्रणाम करो। न नीति की बात, न नीयत की। इसी भीड़ में मुहम्मद सईद भ्रमर भी एक उम्मीदवार हैं। उनकी चुनावी राजनीति खांटी जमीन से जुड़ी है। वह वोटरों को मस्का लगाने के बजाए अपनी नीति और नीयत को जनता के सामने रखते हैं। अब यह नई पीढी पर निर्भर है कि वह विचार की राजनीति करेगी या तामझाम की?
सईद भ्रमर ने रविवार को मोहाना बाजार में एक बड़ी जनसभा की। उन्होंने भीड़ के सामने अपने भाषण के जरिए क्षेत्र के विकास का खाका पेश किया, जो फिलहाल पहले चरण के चुनाव का कोई उम्मीदवार नहीं कर रहा है।

मोहाना की सभा में उन्होंने इलाके की समस्या को उठाया। खेती, किसानीका दर्द, अफसरशाही की लूट, पुलिस जुल्म की हद जैसे तमाम मुदृदों पर अपनी बात रखी। उन्होंने इसे रोकने की रणनीति भी बताई।

सईद भ्रमर अकेले सियासतदान हैं, जो विधायक रहने के अलावा दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं। सिद्धांतों से समझौता न करने वाले भ्रमर जी इस बार भी वहीं कर रहे हैं। लोगों से मिलते हैं, विकास और समस्या पर चर्चा करते हैं। अपने विचार वह जनसभाओं में विस्तार से रखते हैं।

सच तो यह है कि 46 वार्ड में उनके लिए कोई चुनौती नहीं है। लेकिन इस चुनाव के सबसे अधिक आयु के बुजुर्ग भ्रमर तो हैं खांटी वामपंथी। समझौतावाद का शब्द उनकी डिक्शनरी में है ही नहीं। जय-पराजय की उन्होंने कभी फिक्र नहीं की। बस उनका एक ही नारा रहा है, जनता के लिए संघर्ष।

उनकी सभा में सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष राम चंद्र यादव समेत चन्द्रजीत यादव, चन्द्रजीत जायसवाल, सरफराज भ्रमर आदि ने भी भाषण दिया, मगर जिले में भ्रमर द जवाब नहीं।

जहां तक युवाओं की बात है, उनमें न भाषण करने की क्षमता है, न जमीन से जुड़ने की इच्छा शक्ति। सईद भ्रमर के समर्थक समीउल्लाह कहते हैं कि युवाओं को अगर देश और समाज की फिक्र है,  तो उन्हें राजनीति में आने के बाद सईद भ्रमर से प्रेरणा लेनी होगी। दूसरी तरफ युवा उम्मीदवारों की दिक्कत है कि जमीन से जुड़े नहीं होने के कारण उनमें आम सभा करने की हिम्मत ही नहीं है।

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