पीस पार्टी सुप्रीमों को घेरने की तगड़ी घेरेबंदी, डा. अयूब मुश्किल से जीते थे पिछली बार

February 10, 2017 4:33 pm286 commentsViews: 961
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नजीर मलिक

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“यूपी के सतकबीर नगर जिले की खलीलाबाद सीट से पीस पार्टी के अध्यक्ष डा. अयूब के दुबारा लड़ने से यह सीट फिर से सुखियों में है। पिछली बार उन्हें इस सीट पर उन्हें बसपा ने तगड़ी टक्कर दी दी। डा. अयूब बडी मुश्किल से यह सीट जीत सके थे, मगर इस बार लड़ाई और संगीन है, क्योंकि यहां से मीम ने भी अपना उम्मीदवार दे दिया है।”

पिछली बार मिली थी कड़ी टक्कर

२०१२ के चुनाव में यहां से  डा. अयूब को ५५८४१ वोट मिले थे। बसपा के मशहुर अली ने उनको करारी अक्क्र दी थी और ५०४४९ वोट पाकर पांच हजार वोटों से हारे थे। लेकिन इस बार उनके मुकाबले में बसपा के मशहुर अली के अलावा सपा से जावेद चौधरी और ओवैसी की पार्टी मीम से हाजी तफसीर भी मैदान में हैं।

वोटर असंतुष्ट हैं

जानकार बताते हैं कि डा. अयूब पिछले चुनाव में इसलिए जीत गये थे कि मुस्लिम बाहुल्य इस क्षेत्र के मुसलमान एक पार्टी अध्यक्ष के प्रति हमदर्दी रखते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। वोटर उनके पांच साल के कामकाज की समीक्षा करने के बाद ही फैसली करेगा। अयूब ने क्षे़त्र मे कम ध्यान दिया है। इसलिए वोटरों को अपने जवाब से संतुष्ट करना पड़ेगा।

दूसरी बात यह है कि इस बार सपा से जावेद अहमद व मीम से हाजी तफसीर अहमद उन्हें कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। साधन और संसाधनों के लिहाज से हजी तफसीर काफी मजबूत माने जाते हैं। उनकी मदद के लिए मीम सुप्रीमो असद ओवैसी खुद भी खलीलाबाद आ सकते हैं।

मिल सकती है शिकस्त

जानकार मानते हैं कि इस बार खलीलाबाद के मैदाने जंग में कठिन मुकाबले में फंस सकते हैं। मुस्लिमपरस्त वोटरों का एक वर्ग खेमा बदल कर ओवैसी के हाजी तफसीर के साथ भी हो सकता है। स्थानीय होने के कारण मशहुर के अलावा सपा के जावेद अहमद भी लड़ाई का चौथा कोण हैं, ऐसे में डा. अयूब की परेशानियां बढ़ सकती हैं। समीकरण में थोड़ा भी बदलाव उन्हें शिकस्त की राह पर भी ले  सकता है।

हालांकि चुनावी रथ अभी रफ्तार नहीं पकड़ रहा है। इसलिए नतीजे की बात करना बेमानी होगी, लेकिन यह अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है कि गत चुनाव में डा. जैसे बड़े नेता को मशहर आलम जैसे कार्यकर्ता से मिलह तगड़ी चुनौती तथा मीम के हाजा तफ्सीर ने वहां के चुनावी हालात को नाजुक भबना दिया है, लिहाजा एक छोटी से चूक भी पीस अध्यक्ष को भारी पड़ सकती है।

 

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