कटान से फत्तेपुर गांव का वजूद खतरे में, जान बचा कर भागे 27 परिवार, तटबंध पर शरण

August 11, 2025 12:02 PM0 commentsViews: 56
Share news

मुर्गहवा, रीवा अमरिया जैसे कई दर्जन गांवों को उजाड़ चुकी

है बूढ़ी राप्ती नदी, इस बार फत्तेपूर गांव को बना रही निशाना

नजीर मलिक

गांव से भाग कर बंधे पर शरण लिए एक परिवार

सिद्धार्थनगर। बूढ़ी राप्ती नदी सैलाब की दृष्टि से जितनी उग्र है, कटान को लेकर उतनी ही खतरनाक भी है। पिछले दो दशक में इस नदी ने कटान के जरिये केवल चंद मकानों को ही नहीं बरबाद किया, बल्कि गांव के गांव तक को डंस चुकी है, जिसके दंश को ग्रमीण अब तक भूल नहीं पाये है। अपनी इस कुपरम्परा को कायम रखते हुए यह कुख्यात नदी इस बरसात में फत्तेपूर नामक एक और गांव को निगलने की तैयारी में है। जोगिया ब्लाक के इस बदनसीब गांव के 27 परिवार फिलहाल घर छोड़ कर तटबंध अथवा सड़क पर शरण् लिये हुए हैं और एक एक कर अपना आशियाना नदी में विलीन होते बेबस आखों से देख रहे हैं।

फत्तेपूर गांव में बूढ़ी राप्ती के कटान के तेवर,

गांव के संजय बताते हैं कि बूढ़ी राप्ती के तट पर बसा फत्तेपुर एक खुशहाल गांव था। एक दशक पहले यह डेढ़ सौ घरों की बस्ती थी, मगर जबसे बू़ढ़ी राप्ती के नजरें टेढ़ी हुई, गांव के मकान साल दर साल कट कर नदी में समाने लगे। अब इस गांव में सौ से कम मकान बचे हैं। इस साल की कटान के चलते इनमें से निरहु पुत्र कल्लू, संजय पुत्र रामबरन, बासदेव पुत्र प्रहलाद, शंकर पुत्र प्रहलाद,शिवकुमार पुत्र बलिहारी, बुद्धिराम पुत्र हरिद्वार, मुकुत पुत्र बलिहारी, दिनेश पुत्र बलिराम, रामबृक्ष पुत्र भगौती, मंगल प्रसाद पुत्र बलिराम, राम प्रसाद पुत्र भगउती, राजाराम पुत्र जोखू, सीताराम पुत्र जोखू, त्रिभुवन पुत्र जोखू, धर्मराज पुत्र काशी सहित कुल 27 परिवार अपना घर छोड़ कर भाग चुके हैं। वर्तमान में कोई सडत्रक पर रह रहा है तो किसी ने तटबंध पर शरण् ले रखी है।

इस बारे में ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि सर्वजीत पासवान ने सारे पीड़ि़त परिवारों की पूरी सूची तैयार कर इनके आशियाने को बचाने के प्रयास में स्थानीय विधायक, एवं अन्य जिम्मेदारो के आगे पीछे घूम फिर रहे है। लेकिन अबतक कोई सार्थक परिणाम नही निकला। उनका कहना है कि पीड़ित परिवारों ने भाग कर खुद को तो बचा लिया है, मगर उनके घर एक एक कर नदी में विलीन होते जा रहे हैं। इनको बचाने के नाम पर ड्रेनेज विभाग ने कुछ बांस बल्ली जरूर लगाये हैं, मगर इन परिवारों के आवास बचाने के लिए प्रशासन कोई गंभीर पहल नहीं कर पा रहा है। उन्होंने प्रशासन से ग्रामीणों की सहायत की प्रशासन से अपील की है।

कितने गांव उजड़े, बता पाना कठिन

बूढ़ी राप्ती कटान की दुष्टि से कितनी खतरनाक है। इसका अंदाजा ग्राम मुर्गहवा से लगाया जा सकता है। करीब डेढ़ दशक पहले यह गांव देखते ही देखते नदी में विलीन हो गया था। बाद में मंत्री रहे दिनेश सिह ने इसे दुबारा बसाया। इसी प्रकार रीवा अमरिया गांव भी कटान से कई बार बस कर उजड़ चुका है। भुतहवा गांव भी इसके निशाने पर रहता है। इसके तट पर बसने वाले बडे बुजुर्ग बाताते हैं कि बूढ़ी राप्ती ने कितने गांवों को बरबाद किया है यह गिनती बता पाना संभव नहीं है।

 

 

Leave a Reply