एक हादसा, चार लाशें, शहरवासियों का असली दुख लाशें आने पर दिखेगा

July 13, 2025 4:23 PM0 commentsViews: 2720
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जिले की सांस्कृतिक गतिविधियों की जान थे मृतक रामकरन गुप्त, सुजीत जायसवाल, कैलाश मणि त्रिपाठी व मनोज सिंह

 

नज़ीर मलिक

सिद्धार्थनगर। कार दुर्घटना नें चार कामकाजी युवाओं की मौत किसी शहर को रुलाने के लिए काफी है। लेकिन इस खबर से अभी शहरवासी शॉक्ड हैं। कार दुर्घटना रविवार दोपहर को कुशीनगर में हुईं है लिहाज़ा चारों शव पोस्टमार्टम के बाद शहर में सोमवार को ही पहुचेंगे। कल्पना कीजिये उस वक्त स्वजनों, मित्रों मुहल्ले वालों पर क्या गुज़रेगी। सभी मृतकों की शहर में अपनी छवि थी, अच्छी नौकरी के साथ साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक अभी रुचि के कारण ज़िले में उनकी विशिष्ट पहचान थी।

शहर के 6 मित्र कार से बाबा धाम (झारखंड) की यात्रा पर गए थे। इनमें चार मृतक यानी 35 साल के सुजीत जायसवाल एडीओ पंचायत, 45 साल के रामकरण गुप्त कानूनगो, 45 साल के कैलाश मणि शिक्षक, 38 साल के मनोज सिंह थे। बाकी दो घायलों में राजेश शर्मा पत्रकार और प्रशांत शर्मा थे। बताते हैं की रविवार पूर्वान्ह इन सबकी कार कुशीनगर जिले के बगहीकुटी के पास एक ट्रैक्टर-ट्रॉली से जा टकराई, जिससे चार लोगों की मौके पर ही मृत्यु औऱ दो लोग गंभीर रूप से घायल हुए। दुर्घटना चालक के झपकी आने के कारण बताई जा रही है।

यहां यह गौरतलब है कि सभी अपने परिजनों का सहारा बने हुए थे, सुजीत जायसवल, रामकरण गुप्त व कैलाश मणि तो घर के अलावा सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका भी निभाते थे, सुजीत तो सांस्कृतिक आयोजनों के आर्थिक रीढ़ ही थे। यही कारण है कि इस घटना से शहर के सामाजिक व साहित्यिक क्षेत्र में भी दुख का वातावरण बना हुआ है।

मृतकों के मित्र संतोष श्रीवास्तव बताते है कि वे सब मिलकर शहर की साहित्यिक गतिविधियों को जीवंत बनाये हुए थे। अब वो कैसे चलेंगी? रामकरण, सुजीत कैलाश के बच्चे कैरियर की राह चुनने के मोड पर हैं, ऐसी दशा में उनकी शिक्षा दीक्षा का क्या होगा, यह अहम सवाल है।

इस दुखद समाचार के मिलते ही शहर के दर्जन भर लोग कुशीनगर के लिए रवाना हो चुके हैं, दूसरी तरफ मुख्यालय पर मृतकों के मुहल्ले मधुकरपूर में कोहराम मचा हुआ है और स्टेशन रोड पूरब पड़ाव में कोहराम मचा हुआ है। मृतकों के घरों में पुरुषों की आंखें पथराई हुई है तो महिलाओं की आंखों में समंदर उतरा हुआ है। सभी को इंतज़ार है लाशों के आने का। दुखों के पहाड़ टूटने पर माहौल क्या होता है, शहर कल ही महसूस कर सकेगा।

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