उफǃ चारों दोस्तों की लाशें पहुंची तो लगा आंखें बरस रही हैं शहर भीग रहा है’
रात में शवों के आगमन पर मची चीख पुकार सुन कर जाग
उठा सोता शहर, हर कोई भागता दिखा हुतात्माओं के घर
नजीर मलिक
सिद्धार्थनगर। आंसुओं की बरसात हो रही है और शहर भीग रहा है। अब कौन है जो अंगुली पकड कर मेरा कहे, तू आ जा मेरे पास किधर भीग रहा हैॽ यह हादसे में मारे गये उन चारों दोस्तों के 14 अनाथ बच्चों सहित जिले के सिसकते साहित्यिक मंच उठता करूण सवाल है, जो चारों की सजती चिताओं के इर्द र्गिद शिद्दत से उभर कर सामने आ रहा है।
रविवार पूर्वान्हृ बाबाधाम से लौटते समय कार दुर्घटना में मारे गये एडीओं पंचायत सुजीत कुमार जायसवाल, कानूनगो रामकरन गुप्त, सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मणि त्रिपाठी और व्यापारी मनोज सिंह की लाशें देर रात जब मुख्यालय पहुंची तो परिजनों की चीत्कारों से सोता शहर अचानक जाग गया। हर तरफ से लोग मृतकों के घर की ओर भाग रहे थे। आसमान पर बादल जरूर थे, मगर बरसात परिजनों और दोस्तों रिश्तेदारों की आंखें से हो रही थी। शहर का सामान्य व्यक्ति जो उनकी साहित्यिक व सांस्कृतिक सुजनशीलता से परिचित था, उसकी भी आंखें नम थीं। सोमवार जब चारों उठीं तो दुखों के पहाड़ और भी पिघलने लगे। श्मशान में यही चर्चा हर तरफ थी कि अब इन चारों के 14 अनाथ बच्चों के लिए छत्रछाया कौन बनेगा? जिले की साहित्यक गतिविधियों को जीवंतता अब कौन प्रदान करेगा?
हुतात्मा रामकरन, सुजीत मनोज के तीन तीन तथा कैलाश मणि के 5 बच्चों की अभी शादी नहीं हुई थी। अब दुखों की बरसात में हाथ में संरक्षण की छतरी लेकर कौन कहेगा कि तू आ जा मेरे पास, किधर भीग रहा है? यही सवाल पूरे शहर को व्यथित कर रहा है। बात यहीं तक नहीं है। जिला मुख्यालय बनने के बाद यहां अरसे से मृतप्राया: पड़ी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को अब आक्सीजन का प्रबंध कौन करेगा? यह भी लोग पूछ रहे हैं।
मरने वालों के बचपन के मित्र रहे संतोष श्रीवास्तव बताते है कि प्रतिमाह साहित्यिक आयोजन करना, लगभग 50 लोगों के भोजन पानी की व्यवस्था निजी तौर पर वहन यही लोग करते थे। साहित्य संगम के अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव बताते हैं कि उनके बिना इस प्रकार के आयोजन संभव ही नही था। जिले के प्रतिष्ठित शायर नियाज कपिलवस्तुवी का कहना है कि उनके बच्चे ही अनाथ नहीं हुये, यहां के साहित्यिक जगत भी अनाथ हो गया। स्थानीय कवियित्री सीमा मिश्रा बहुत सदमे में हैं वे बताती है की उनके निधन से साहित्य औरसमाज की अपूरणीय क्षति हुई है। कवि और शिक्षक विनय कांत मिश्र कहते हैं कि उनके परिवारों पर दुख का पहांड टूटा है, लेकिन हमारा सांस्कृतिक संसार भी सूना हो गया है।
उन चारों की चिताएं जलने के बाद राख ठंडी होने को है। लोग श्मशान से लौट चुके हैं, मगर उन चारों के घरों से 14 अनाथों के रुदन फिजां में तैर रहे हैं, मानों वे कह रहे हों की दुख की वर्षा में अब कौन है जो अंगुली पकड़ मेरी कहेगा, आ जाओ मेरे पास किधर भीग रहे हो?






