सडकें टूटीं, सिंचाई की नहरें सूखीं, ‘सो रही सरकार’ से कैसे करें फरियाद?

August 30, 2015 5:33 pm0 commentsViews: 80
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अजीत सिंह

000000000000000000000हल्की सी बारिश में ऐसा हाे जाता है सड़कों का हाल

“सिद्धार्थनगर जिले में आवागमन के लिए 24 सौ किलोमीटर लंबी सड़कों का नेटवर्क है। किसानों की सिंचाई के लिए यहां 5 सौ किलोमीटर की नहर भी बनी है। मगर नहरें सूखी हैं और सड़कें टूटी। हाल यह है कि आम आदमी की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। क्या जनपद हो या तहसील मुख्यालय।”

पूरे ज़िले में एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ने वाली सड़कों दम तोड़ चुकी हैं। सिद्धार्थनगर से बस्ती, गोरखपुर, बलरामपुर, बढ़नी, डुमरियागंज मार्ग पर सफर करना मौत की तरफ कदम बढ़ाना है। इसीलिए इन सड़कों पर चलने वाला हर शख्स अपने जनप्रतिनिधियों को हिकारत की नज़र से देखने के लिए मजबूर है। जनपद मुख्यालय से निकलने वाली चारों दिशाओं की सड़कों पर गहरे गढ्ढों की भरमार है।

नौगढ-बांसी मार्ग के साड़ी तिराहे से आगे बढ़ते ही कृषि भवन से लेकर बांसी तक गढ्ढों में फंसकर आये दिन कोई न कोई चोटिल हो रहा है। मज़े की बात यह है कि इन्हीं रास्तों से डीएम से लेकर सांसद, विधायक एवं खुद विधानसभा अध्यक्ष तक  अक्सर गुजरते हैं। मगर लग्जरी गाड़ियों में सफर करने की वजह से इन्हें इस दर्द का पता नहीं चलता।

इसी तरह ज़िले की ज़्यादातर नहरें नहरें सिल्ट से पटी हैं। अभी तक तो किसानों ऊपर वाले ने निराश नहीं किया है। मगर सामान्य से कम बरसात होने के कारण अब किसानों को पन्द्रह दिन बाद जब पानी की ज़रूरत पडे़गी, तब उनका भगवान ही मालिक होगा।

नहरों के जलाशयों से पानी गायब है। सिल्ट की वजह से जलाशयों की क्षमता घटती जा रही है। ऐसे में किसान को अपनी फसलों की बर्बादी देखनी पड़ सकती है। सरकारी उपेक्षा के कारण जमींदारी नहर प्रणाली भी अब अंतिम सांसे गिन रही हैं। इस सिलसिले में लोकनिर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता सीपी गुप्ता का कहना है कि प्रदेश सरकार जिला मार्गों के निर्माण के लिए अधिकतम 15 टन वाले वाहनों को ध्यान में रखकर बजट देती है। मगर उन पर 50 टन भार वाले वाहन चलते है। ऐसे में सड़क टूटने से रोक पाना उनके बस की बात नहीं है। दूसरी तरफ ड्रेनेज खंड के अभियंता आफिस में बैठते नहीं हैं, लिहाजा कोई बात नहीं बन पाती। विभागीय सूत्रों का मानना है कि जमींदारी नहर मरने के कगार पर हैं। शासन अगर उन्हें ही बचाने के लिए कुछ उपाय कर ले तो किसानों के हिस्से भी कुछ खुशहाली आ सकती है।

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