बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार दिया जाना अति आवश्यक- आचार्य संतोष
श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन ध्रुव की भक्ति, अडिग संकल्प व संस्कारों का किया वर्णन
अजीत सिंह
सिद्धार्थनगर। श्री श्री राधा कृष्ण मंदिर विवेकानंद भीमापार में चल रहे संगीत में श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन कथा व्यास आचार्य संतोष शुक्ला जी महाराज ने ध्रुव के चरित्र, भक्ति, अडिग संकल्प और माता सुनीति के उच्च संस्कारों की अत्यंत प्रेरणादायक कथा का रसपान कराया।
कथा व्यास आचार्य संतोष शुक्ला जी महाराज ने कहा कि राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं, बड़ी रानी सुनीति (ध्रुव की माता) और छोटी रानी सुरुचि (उत्तम की माता)। राजा का अधिक प्रेम छोटी रानी सुरुचि के प्रति था। एक बार पाँच वर्ष के बालक ध्रुव ने पिता की गोद में बैठना चाहा, लेकिन सौतेली माँ सुरुचि ने उन्हें खींचकर नीचे गिरा दिया और ताना दिया कि यदि तुम्हें राजा की गोद में बैठना है, तो मेरी कोख से जन्म लेना चाहिए था।
दुखी होकर ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास गए। माता सुनीति ने धैर्य बंधाया और समझाया कि यदि तुम उस अचल जगतपिता (भगवान विष्णु) की गोद में बैठ जाओगे, तो तुम्हें कभी नीचे नहीं उतरना पड़ेगा। बालक ध्रुव भगवान को पाने के लिए रातोंरात वन की ओर निकल पड़े। मार्ग में उन्हें देवर्षि नारद मिले। ध्रुव के दृढ़ निश्चय को देखकर नारद जी ने उन्हें ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र की दीक्षा दी।
ध्रुव ने मधुबन में जाकर अडिग मन से भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान प्रकट हुए और उन्हें अचल ‘ध्रुव पद’ (ध्रुव तारा) का वरदान दिया। प्रसंग के माध्यम से कथा व्यास ने संदेश दिया कि बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार दिया जाना अति आवश्यक है कथा के बीच-बीच में सुमधुर भजनों से वातावरण भक्ति में रहा।
इस दौरान महेश मणि त्रिपाठी, चंद्र प्रकाश मिश्रा, गणेश तिवारी, राजकुमार शर्मा, दिनेश मिश्रा, राजेश मणि त्रिपाठी, प्रेम पांडेय, रंजनेश दूबे, दिनेश भार्गव, कृष्ण मोहन उपाध्याय, ओपी मिश्रा, सुभाष तिवारी, अजय त्रिपाठी, बलदाऊ जी शर्मा, एसपी त्रिपाठी आदि भारी संख्या में लोग मौजूद रहे।





