दीपावली के दूसरे दिन पूरे नेपाल हुई कुकुर पूजा, भायलो नृत्य पर जम कर थिरका पहाड़ी समाज

November 13, 2015 8:41 am0 commentsViews: 640
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नजीर मलिक

kathmandu

दीपावली के दिन से शुरू होने वाले पांच दिनी तिहार पर्व के दूसरे दिन नेपाल के पहाडी समुदाय में कुकर पूजा की रस्म जोर शोर से शुरू हुई। नेपाल के पोखरा, काठमांडू जैसे पर्वतीय इलाकों में तो जश्न रहा, तो मैदानी क्षेत्र के नेपालगंज, कृष्णानगर और तौलिहवा, चनरौटा जैसे स्थानों पर भी कुकर पूजा की धूम रही। इस मौके पर पहाड़ी समुदाय ने जम कर जश्न मनाया।

जानकारी के मुताबिक चनरौटा, तौलिहवा आदि उपनगरों में  सुबह कुत्तों को नहला धुला कर उनक पूजा की गई। इसके बाद उन्हें खाने के लिए अच्छे पकवान दिये गये। कुकुर पूजा के बाद पहाड़ी युवक युवतियों की टोलियों ने क्षेत्र के प्रमुख घरानों के यहां दस्तक देकर भायलो नृत्य पेश किया और उनसे इनाम के साथ अर्शीवाद भी प्राप्त किया। कृष्णानगर के सांसद अभिषेक प्रताप षाह के अवास पर भी टोली ने घंटों भयलो नृत्य किया।

कुकुर पूजा के मौके पर पुलिस विभाग के डाग स्क्वाड में शामिल कुत्तों की भी पूजा की गई। काठमांडू में नेपाल के सबसे बडे पुलिस केन्द्र पर सकडों कुत्तों की पूजा की गई। कुकर पूजा के साथ भायलो कार्यक्रम देर तक चलता रहा।

क्या है तिहार और कुकुर पूजा

परिंदों और चरिंदों के  प्रेम की अनूठी मिसाल है नेपाल का तिहार पर्व। तिहार ठीक वैसे ही मनता है जैसे दिवाली। पांच दिन के इस पर्व की शुरुआत दीपावली  के दिन काग पूजा से होती है और समापन भाई टीका से। दूसरे दिन कुत्तेए तीसरे दिन गायए चौथे दिन बैल व पांचवे दिन भाई पूजा होती है। परंपरा ही सहीए मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि इस दिन यही यहां के शाही मेहमान होते हैं।

तिहार दिवाली के दिन से मनाई जाती है। प्रथम दिन कागभुसुंडी ;कौआद्ध का। मान्यता है कि उन्हें जो खिलाया जाएगाए स्वर्ग में वही पूर्वज पाएंगे। भारत में पितृपक्ष में उन्हें भोजन दिया जाता है पर वहां इस दिन इनकी पूजा होती है। दूसरे दिन कुत्तों को विशेष सम्मान मिलता है। उन्हें माला पहनाई जाती है।आशीर्वाद का प्रतीक तिलक लगाया जाता है। लजीज भोजन एवं मिठाइयां खिलाई जाती है।

हिंदू धर्मग्रंथ महाभारत के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर की स्वर्ग यात्रा में कुत्ते ने उनका साथ दिया था। तीसरे दिन गाई ;गायद्ध पूजा होती है। उनके साथ भी वही सम्मान व खानपान अपनाया जाता है। चौथे दिन बैल की पूजा होती है। गोवर्धन पूजा की जाती है। पर्व के अंतिम दिन भाई टीका रस्म है। इस दिन बहने भाइयों को टीका लगाती हैं उनकी आरती उतारती हैं और यमराज से प्रार्थना करती हैं कि वह उनके भाई को सुरक्षित रखें।

इसलिए होती है पूजा

नेपाल में मान्यता है कि जैसी निकटता इन पशु.पक्षियों की आम आदमी से होती हैए वैसी किसी और जानवर की नहीं। नेपाल में इस पर्व की महिलाओं को साल भर से प्रतीक्षा रहती है। महिलाएं गुन्जा चोली पहन भायलो गीत गाती हैं और इनका नमन करती हैं। नेपाल के बकौली मंदिर के पुजारी विश्वम्भर मिश्र कहते हैं कि मान्यता है कि पशु.पक्षियों की सेवा करके इंसान को मुक्ति मिलेगी।

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