आसमान से कुदरत का कहर, जमीन पर चोरों, जमाखोरों का आतंक, दोहरी मार से लग सकता है लाशों का अंबार?

April 25, 2020 12:21 pm0 commentsViews: 574
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— पड़ोसियों और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद के सहारे कब तक जी सकेंगे गरीब, कल क्या होगा?

— गांवों में कोटेदारों की ब्लैमार्केटिंग, किराना और सब्जी की दूकानों पर मनमाना रेट की वसूली जारी

नजीर मलिक

सिद्धार्थनगर:  जिले में एक तरफ कुदरत के कहर करोना एवं उससे उपजे लाकडाउन से जनता तिगनी का नाच नाच रही है। उससे बचिये तो जमीन पर कालाबाजारी करने वाले गरीबों को मारे डाल रहे हैं। ऐसे में इस वर्ग का कोई पुरसाहाल नहीं है। अगर उन गरीबों के पडोसी और समाजसेवी न होते तो नियमों कानूनों के मकड़जाल में उलझी शासकीय योजनाओं के चलते जाने कितने ही गरीब दम तोड़ चुके होते। मुमकिन यह भी है कि गांवों शहरों में लाशों के अम्बार लग जाते।

बताया जाता है कि करोना से जंग में पूरे जिले की हालत खस्ता हो गई है। एक तो करोना के खतरे से इंसान वैसे ही भयभीत था ऊपर से कुदरत और जमीन की  दो तरफा मार ने इंसान को तोड़ दिया है। जिले के किसान राकेश पांडेय बताते हैं कि पहले कुछ लोग कम्बाइन से और कुछ मजदूरों से गेहूं कटवाते थे, लेकिन इस साल लाकडाउन के कारण सभी ने मशीनों से गेहूं कटवाना चाहा तो कम्बाइन की कमी पड़ गई। ऊपर से आंधी, पानी ने काम में बाधा डाल रखा है।

यही नहीं कुदरत की मार के इतर जमीनी मार ने तो छोटे किसान और गरीब वर्ग को और भी घायल कर रखा है। सदर ब्लाक के किसान न ग्राम अहिरौली के प्रधान विजय यादव का कहना है एक तो सरकार गरीबों को वैसे ही कम राशन उप्लब्ध करा पा रही है, ऊपर से कोटेदार उसे बेच दे रहे है। किराना और सब्जी व्यापारी मनमाना रेट वसूल रहे हैं। मगर प्रशासन किसी दुकादार पर सख्त कार्रवाई नहीं कर सका है। हां, उसने इक्का दुक्का कोटेदारों पर मुकदमा जरूर दर्ज कराया है, किसी को जेल भेजने में नाकाम रहा है।

यही नहीं दिहाड़ी मजदूरों की हालत और भी खराब है। लाक डाउन से उनकी मजदूरी का काम बंद है।  मजदूर रामचेत दास का कहना है कि लाकडाउन में एक पैसे की कमाई नहीं हुयी, वरना वो निर्माण कार्यों में प्रतिदिन तीन सौ कमा लेते थे और उनके परिवार के सात लोगों की रोटी दाल का जुगाड़ हो जाता था। मगर लाकडाउन से बच्चों का निवाला तक छिन गया।

ग्राम देवपुर के पढ़े लिखे मजदूर अखिलेश कहते हैं मजदूरी के अभाव में अब घरों में उपवास की नौबत आ गई है। सरकार मदद देने में फेल साबित हुई है। ऐसे में यदि 20 अप्रैल के बाद लाकउाडन बढ़ा तो उतनी मौत करौना से भी नहीं होगी, जितनी की भूख के चलते गरीब की होगी। इसलिए सरकार को इसके लिए प्रयास करना चाहिए।

फिलहाल जिले में रोटी के लिए गरीबों में कोहराम हैं। कुछ खाते पीते लोग मदद देकर, कुछ कर्ज देकर, कई छोटी छोटी संस्थाएं एक दो किलो चावल, आंटा बांट कर गरीबों की हालत संभाले हुए हैं, मगर सवाल है ऐसा कब तक और कितने दिन चल सकेगा?

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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