विधानसभा सीट बांसी में इस बार बेहद रोचक होगा राजा बनाम रंक का मुकाबला

January 9, 2022 2:24 pm0 commentsViews: 1958
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जयप्रताप के लिए सिद्ध हो सकता है जीवन का कठिन चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति

नजीर मलिक


सिद्धार्थनगर। जिले की सबसे हाट सीट विधानसभा क्षेत्र बांसी की है। यह जिला सृजन के बाद से हुए अब तक आठ चुनावों में से 7 बार जय प्रताप सिंह और एक बार उनके पारम्परिक प्रतिद्धंदी व सपा नेता लाल जी यादव को जीत मिली है। इस बार के चुनाव में बांसी सीट पर लड़ाई रोचक और रोमांचक दिखने के आसार है। अनुमान है उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जयप्रताप सिंह इस बार इनकम्बेंसी के शिकार हो सकते हैं। इसलिए माना जा सकता है कि इस चुनाव में सपा की जीत की संभावनाएं पूर्व की अपेक्षा अधिक बन सकती है।

सिद्धार्थनगर जनपद के सृजन के बाद जिले में प्रथम चुनाव वर्ष 1989 में हुआ था तब जयप्रताप सिंह राजमहल छोड़ कर पहली बार निर्दल की हैसियत से मैदान में उतरे थे और 55610 पाकर भाजपा के तत्कालीन मंत्री हरीश्चन्द्र उर्फ हरीश जी को घूल चटाया था। तब हरीश जी को कुल 9508 ववोट ही मिल सके थे। 1991में जय प्रताप पुनः निर्दल जीते। इसी चुनाव में पहली बार सपा के लाल जी यादव भी मैदान में उतरे। तब से लेकर आज तक बांसी की राजनतिक लड़ाई इन्हीं दोनों के बीच सिमटी हुई है। 1993 का चुनाव जयप्रताप सिंह भाजपा से लड़े और 60243 वोट पाकर विजयी रहे। लालजी यादव को 42473 वोट मिले।

इसके बाद वर्ष 1996 व 2002 का चुनाव पुनः जय प्रताप सिंह ने फतह किया लेकिन इस बीच लाल जी यादव ने लगाातार अपनी हार का अंतर घटाते रहे और अंततः 2007 के चुनाव में राजा जयप्रताप सिंह को हराने में सफल हो ही गये। इस बार लालजी यादव को 38648 वोट मिले तथा जय प्रताप सिंह सिर्फ 36134 वोट ही मिल पाये। लेकिन 2012 के चुनाव में जय प्रताप ने अपनी हार का बदला ले लिया। इसके बाद 2017 का चुनाव जीत कर वे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने। इस प्रकार पिछले आठ चुनाव में लालजी मात्र एक बार ही जय प्रताप को हराने में सफल हो सके।

अब सवाल है कि क्या नौवे चुनाव में लालजी यादव 2007 का नतीजा दुहराते हुए जीत हासिल कर सकते है अथवा जयप्रताप सिंह अपनी जीत का इतिहास रचते ही जाएंगे? इस पर अलग अलग जानकारों के अलग अलग मत हैं। अधिकांश विश्लेषकों का कहना है कि निरंतर जीत के कारण जयप्रताप सिंह के खिलाफ इनकम्बेंसी अधिक है। इसलिए लोग बदलाव चाहते हैं। यही नहीं मंत्री बनने के बाद उनका क्षेत्र से सम्पर्क भी घटा है। दूसरी तरफ निरंतर हार के कारण लालजी यादव के प्रति जनसहानुभूति भी बढ़ी है। राजनीतिक विश्लेषक यह भी मान रहे हैं कि इस बार ब्राहमणों में सरकार के प्रति गुस्सा है और बांसी क्षेत्र में ब्राह्मण अधिक हैं। इसलिए स्थिति प्रतिकूल दिखती है जिसे अनुकूल बनाने के लिए जय प्रताप सिंह को अनथक मेहनत करनी पड़ेगी। दूसरी तरफ सपा (लालजी यादव) के लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न है। वह अभी नहीं तो कभी नहीं मान कर चुनाव की तैयारी में लगे हुए हैं। फिलहाल देखिए टिकट वितरण के बाद बांसी की राजीनीति कौन सी करवट लेती है।

(1890)

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