जनता के बीच जड़ें जमा रहा विद्यालय पेयरिंग को लेकर सरकार विरोध का मुद्दा
गांव का विद्यालय बंद होने पर चार साल का बच्चा साधनों के
अभाव में केसे पहुंच पायेगा पड़ोस के दूरस्थ गांव के विद्यालय
नजीर मलिक
कम बच्चों की तादाद वाले विद्यालयों को बंद कर उसे दूसरे स्कूलों में विलय कर देने की सरकारी नीति का विरोध अब घीरे घीरे जमीन पर ज़े जमाने लगा है। पहले इस नये नियम के विरोध में छिटपुट आवाजें ही उठी रही थीं, लेकिन अब यह मुद्दा समाज के हर वर्ग के बीच अपनी जड़ें जमाता दिख रहा है।
पेयरिंग की नीति को लेकर जिले में जो विवाद है, उसे जाजने से पहले यह जनना होगा कि जिस गांव के प्राइमरी स्कूल में 50 से कम बच्चे पंजीकृत होगों उन्हें बंद कर बच्चो को पडत्रोस के स्कूल में भेज दिया जाएगा। भले ही पडोस का स्कूल दो या तीन किमी दूर स्थिति हो। सारा विरोध में भी इसी नियम को लेकर है। अभिभावकों का कहना है कि कक्षा एक में पढ़ने वाला बच्चा औसतन चाारसाल का होता है। ऐसे में अपने गांव का स्कूल बंद हो Rतो वह एक दो तीन किमी दूर के विद्यालय में कैसे जा पायेगा। ग्रामीण परिवेश में च्चों को लाने ले जाने तथा बच्चों के अिफि की समस्या हो जायेगी। अभिभावक विनीत कुमार कहते हैं क गांव के गरीबों के पास न साधन होात है न ही लंच बाक्स देने के लिए आर्थिक संसाधान होते हैं। ऐसी ही सोच हर ग्रामीण की है।
अभिभावक ही नहीं खुद शिक्षक भी सरकार की इस नीति के विरोध में हैं। मंगलवार को प्रथमिक शिक्षक संघ ने इस सवाल को लेकर स्थानीय बीएसए कार्यालय पर धरना दिया। प्रशिसं अध्यक्ष राधारमण त्रिपाठी का आरोप था कि सरकार धीरे धीरे शिक्षा का निजीकरण करने में लगी है। पेयरिंग व्यवस्था उसी साजिश का अंग है। उन्होंने इस मुद्दे पर संघर्ष की बात भी कही।
पेयरिंग के मुद्दे पर राजनीतिक दल भी सामने आने लगे हैं।
सोमवार को जिला कार्यालय समाजवादी पार्टी की बैठक में भी पेयरिंग का मुद्दा जोर शोर से उठाया गया। बैठक में सापा जिलाध्यक्ष लालजी यादव ने कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार गरीबों के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने के लिए परिषदीय विद्यालयों को पेयरिंग कर रही है। संसाधन बढ़ाने के बजाए सरकार एक-एक करके प्राथमिक विद्यालयों को बंद करने पर तुली है, जिससे अध्यापकों की भर्ती न करनी पड़े। सरकार के इस मनमाने रवैये के खिलाफ आंदोलन करेंगी। याद रहे सपा का जनाधार ग्रामीण क्षेत्रों में है। इसलिए ह इस मुद्द पर जोर देगी ही।
यही नहीं जिले में ग्राम प्रधानों का एक वर्ग भी इसके खिलाफ देखा जा रहा है। उसका मानना है कि यह गांव बनाम शहर का बंटवारा है। जिसमें गांव वालों को भुगतना पड सकता है। कुल मिला कर विद्यालय पेयरिंग का मुद् गांवों में ज़ें जमा रहा है। कुछ लो पेयरिंग विरोध को सरकार के विरोध की भी संज्ञा दे रहे हैं।





